Saturday, March 30, 2013

बाजार की भेंट चढे़ दो स्कूल

       जयप्रकाश शाला और कस्तूरबा कन्या शाला को अपनी जगह खाली करनी पड़ रही है। जिस जगह दोनों स्कूल चल रहे थे वह बाजार के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वहां अब नगरपालिका बेसमेंट में पार्किंग और ऊपर शापिंग काम्पलेक्स का निर्माण करवाएगी। इससे नगरपालिका की आमदनी बढे़गी और कस्बे को एक खूबसूरत बाजार मिलेगा। शहर के व्यापारियों का भी भला होगा और कस्बे के विकास में भी चार चांद लग जाएंगे। और इन दो स्कूलों के बारे में कोर्इ सोचे भी क्यों? सबके बच्चे तो पबिलक स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इन दोनों स्कूलों में छात्र या छात्राओं की संख्या 20-25 ही रह गर्इ है। जाहिर है इनमें गरीबों से भी गरीब और कमजोरों के बच्चे ही पढ़ रहे हैं। भला कमजोरों की फिक्र आजकल कौन करता है?
       बेचारे दोनों प्राइमरी स्कूल, कस्बे के बीच में बसने की सजा पा रहे हैं। हालांकि उस समय आबादी कम थी और सोचा यह गया था कि छोटे बच्चों का स्कूल कस्बे के बीच में ही होना चाहिए ताकि घर से उनकी दूरी ज्यादा न हो। जमाना बदलते ही कल की सहूलियत आज भारी पड़ने लगी। दोनों स्कूल चारों तरफ दुकानों से घिर गए थे। स्कूल के सामने की पतली गली में कर्इ दुकानों के दरवाजे खुलते हैं। गुजरे जमाने में इतनी दुकाने नहीं थीं। तब गली में नन्हे मुन्नों की भीड़ ही दिखती थी। वक्त के साथ सब कुछ बदल गया। अब ये दोनों स्कूल मोहता प्लाट में शिफ्ट हो जाएंगे। जाहिर है इनमें अब पुराने दिनों जैसी चमक नहीं होगी। दोनों स्कूलों में बच्चे घटने से नगरपालिका निशिंचत है। मामूली सुविधाएं और तंग जगह में भी कमजोरों के बच्चे पढ़ सकते हैं।

और यह हैं हम
          ये दोनों स्कूल सटे हुए थे। पहले जयप्रकाश शाला और उसकी दीवार से सटी कस्तूरबा कन्या शाला। मेरा इन दोनों स्कूलों से गहरा नाता रहा है। जयप्रकाश शाला में पांचवीं तक पढ़़े हैं और कस्तूरबा कन्या शाला में अम्मा शिक्षिका थीं इसलिए वहां भी खूब आना-जाना होता था। पहली-दूसरी में तो साथी लड़कियों के साथ खेले-कूदे भी हैं। अम्मा की साथी बहनजियों से भी बहुत स्नेह मिला। उन दिनों दोनों स्कूलों में बच्चों की भीड़ होती थी। कस्बे में प्राइमरी स्कूल तो सात-आठ थे लेकिन इन दोनों स्कूलों की बात ही कुछ और थी। ये घर के निकट थे और सबसे सम्मानित स्कूल माने जाते थे। स्कूल के बाहर पतली गली में लबदो, बेर, गोल मिठार्इ लेकर दुकानदार बैठते थे। मूंछ वाले शंकर की गोल मिठार्इ प्रसिद्ध थी। वह आवाज भी जोरदार लगाता था, गो...ल...मिठार्इ.....। यहीं लक्ष्मी सोनी की मां लबदो की टोकनी लेकर बैठती थीं। बाद में जयप्रकाश शाला के एक हिस्से में अशोक प्राथमिक शाला भी कुछ साल तक चली। इस स्कूल में राजा और रंक दोनों के बच्चे पढ़ते थे। कस्बे के धन्ना सेठों के बच्चों के साथ फुटपाथी दुकानदार या मजदूरों के बच्चों की भी दोस्ती हुआ करती थी। खेलकूद या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सब मिलजुलकर हिस्सा लेते थे।
       मैंने अपने जीवन का पहला नाटक जयप्रकाश शाला में ही किया था। शायद पांचवीं कक्षा में, स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान। कहानी तो याद नहीं लेकिन उसमें मैंने कम्पाउंडर का रोल किया था। डाक्टर गोपाल मालपानी बना था और दो मरीज बने थे वेणुगोपाल काबरा और मधुसूदन काबरा। इसके वर्षों बाद किशोर भारती में शम्शुल इस्लाम और नीलिमा शर्मा ने हमें नुक्कड़ नाटक का प्रशिक्षण दिया। इस दौरान तीन नाटक तैयार किए गए। इन नाटकों का प्रदर्शन भी जयप्रकाश शाला के परिसर में ही किया गया था। भगतसिंह नाटक में ओमप्रकाश रावल के बेटे असीम ने भगत सिंह का रोल किया था। पिपरिया से इन नाटकों में किशन व्यास, मुकेश पुरोहित, श्रीगोपाल, लक्ष्मी सोनी और कुछ होशंगाबाद के साथियों ने भी भूमिका निभार्इ थी। इसके बाद भगतसिंह पुस्तकालय की कुछ पोस्टर प्रदर्शनियां और कार्यक्रम भी इस शाला में हुए।
       जयप्रकाश शाला की पहली मंजिल पर कभी एक बड़ा हाल था जिसमें जनता वाचनालय चलता था। पिछले साल दीवाली पर जनता वाचनालय में किसी पटाखे से आग लग गर्इ। जनता वाचनालय का पुराना रिकार्ड और किताबें राख हो गर्इं। उसके बाद से जयप्रकाश शाला के एक कमरे में जनता वाचनालय चल रहा था। अब जनता वाचनालय का क्या होगा, खबर नहीं है। जनता वाचनालय 1965 के आसपास क्षेत्र के समाजवादी नेता और नगरपालिका अध्यक्ष जग्गू उस्ताद ने शुरू करवाया था। जनता वाचनालय सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए भी दिया जाता था, इसलिए भगत सिंह पुस्तकालय की कर्इ विचार गोषिठयां और कार्यक्रम वहां हुए। पुस्तकालय की शुरुआत के पहले दिन शाम को आयोजित विचार गोष्ठी जनता वाचनालय में ही हुर्इ थी जिसे नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंæ माथुर ने संबोधित किया था। इसके बाद विजय बहादुर सिंह, चंडीप्रसाद भटट, अदम गोंडवी, हरजीत, एमपी परमेश्वरम, विनोद रैना, दीनानाथ मनोहर, माइज रस्सीवाला आदि कर्इ विद्धानों ने यहां जनता को संबोधित किया था। यहीं समता युवजन सभा और समता संगठन की सभाएं भी हुर्इं। रामजन्म भूमि के मुददे पर यहां आयोजित किशन पटनायक की सभा में कटटरपंथियों ने हमला कर दिया था। 
       नए जमाने के बच्चों का इन दोनों स्कूलों से कोर्इ लेना देना नहीं है, लेकिन हम जैसे पुराने लोगों की स्मृति में ये हमेशा रहेंगे। पहली बार स्लेट पर मिटटी वाली कलम से लिखना और क ख ग घ से लेकर हिज्जे करके हिन्दी पढ़ना। नीचे टाट की फटिटयों पर बैठना और खूब धमाचौकड़ी मचाना भला कैसे भूला जा सकता है? 
पीछे बोर्ड बेशक अशोक प्राथमिक शाला का है लेकिन यह जयप्रकाश शाला के दूसरी कक्षा के बच्चों का ग्रुप फोटो है। इसमें शिक्षक हरिशंकर अग्रवाल और उनके साथ खड़े हैं अशोक तोषनीवाल। इस तस्वीर में पिपरिया की कर्इ नामी हसितयां हैं वेणुगोपाल काबरा, मधुसूदन काबरा, गोपाल मालपानी, गोविंद वल्लभ, सुरेश गुप्ता, मोहन, केशव, मनोहर और कर्इ नाम तो मैं भी भूल गया। यह तस्वीर संभवत: 1966-67 की होगी।


Friday, March 15, 2013

दादू ...दादू...दादू

हम पर भी जंचती है दादू की टोपी
दादू उठो, गौरव आ गया न
दादू समझा करो न।
सुबह निहायत ही मीठी आवाज के साथ मेरी नींद खुलती है। वह नन्हा फरिश्ता जोर से आवाज लगाता है दादू...दादू... दादू....। कभी मेरी नींद खुल गई तो मैं दरवाजा खोल देता हूं या उसके चाचू या आंटी दरवाजा खोल देती हैं। वह सीधे मेरे दीवान के बगल में रखी कुर्सी पर बैठता है और फिर कहता है दादू गौरव आ गया। उसके चेहरे पर निगाह पड़ते ही नींद गायब हो जाती है।
मोबाइल पर खेल, अमल चाचू के साथ
उस नन्हे चेहरे पर फूल सी मुसकान और आवाज में ऐसा मीठा जादू कि वक्त भी ठहर कर सुनने को मजबूर हो जाए। वह लगातार बोलता है। मुसकान शरारत की तरह उसकी आंखों से झांकती रहती है। वह फिर सुर लगाता है जूता उतार दो न। वह मेरे बिस्तर पर आना चाहता है। दूसरी तरफ एक खिड़की है। वह खिड़की के पास खड़ा होता है और खुशी से चहकता है दादू कबूतर आ गया। कई बार मैं गहरी नींद में होता हूं और वह मेरी सवारी करता हुआ मुझे जगाता है ‘दादू गौरव आ गया न।’
अबीर चाचू के साथ मस्ती
कुछ हमको भी तो बताओ दादू
ढाई साल का यह बच्चा जैसे सचमुच मेरा पोता बन गया है। मेरे घर का नया सदस्य। वह पूरे अधिकार के साथ बात करता है। और मुझे तो वह नन्हे फरिश्ते की तरह लगता है। उसके लिए वह सब कुछ करने को मन करता है जिससे उसकी आंखों की चमक बढ़ जाए। उसकी बातें परीलोक जैसी लगती है। लगता है वह बोलता रहे और हम सुनते रहें। मजे की बात यह है कि वह इस बात को जानता है  इसलिए लगातार बतियाते रहता है। उस वक्त मुझे लगता है मैं कुदरत का सबसे मीठा गीत सुन रहा हूं। जीवन का यह संगीत मुझे दूसरी ही दुनिया में ले जाता है।
आंटी ने बांध दी चोटी
यह नन्हा फरिश्ता मेरे सामने वाले फ्लैट में रहता है। उसका नाम गौरव है। वह अभी कुल ढाई साल का है। उसकी आवाज में गजब की मिठास है। वह धीरे धीरे कुछ तुतलाकर कुछ साफ मगर पूरे मनोयोग से बात करता है। मेरी पत्नी को वह आंटी कहता है। मेरे बेटे उसके अबीर चाचू और अमल चाचू हैं। वह अपना नाम बताता है ‘गौरव मिचला (मिश्रा) पापा का नाम धर्मवीर मिचला और मम्मी का नाम आरती मिचला।
उसकी दादी गांव में रहती है। उसकी मम्मी का कहना है कि गौरव के दादू नहीं है, लेकिन उसे दादू का प्यार मिलना था इसलिए अंकल मिल गए। ये लोग मिथिलांचल, बिहार के हैं। मां मधुबनी की और पिता सीतामढ़ी के। घर में गौरव से मम्मी-पापा मैथिली में बात करते हैं और दादू के यहां सब हिन्दी में बात करते हैं। अब गौरव बातचीत में मैथिली और हिन्दी दोनों का इस्तेमाल करता है। आंटी ने उसे मछली रानी और मुर्गी मां वाले दो गीत याद करवा दिए हैं। वह दोनों गीत इतने दिलकश अंदाज से सुनाता है कि आप निहाल हो जाएं। उसका डांस भी उतना ही दिलकश होता है। कई बार वह मुझे अपने दोनों बेटों का बचपन याद दिला देता है।
आप भी अखबार पढ़ो दादू और हम भी पढ़ेंगे 






Sunday, February 10, 2013

यारब तराना हराम कैसे

कश्मीर में गीत-संगीत के खिलाफ एक मुफ्ती के फतवे का विरोध
और लड़कियों के प्रगाश बैंड के समर्थन में खुदा के बंदों से सवाल


गाना बजाना हराम कैसे
यारब तराना हराम कैसे

दिल को मेरे सुकून आए
तो गुनगुनाना हराम कैसे
 
दिल दुखाना गुनाह बेशक
पर गीत गाना हराम कैसे

कव्वाली, ठुमरी, राई, राक
ये सब खजाना हराम कैसे

मौसि़की है खुदा की नेमत
तो सुर सजाना हराम कैसे

मंजूर दिल की धड़कनें तो
ठुमके लगाना हराम कैसे

साज ए दिल भी पूछता है
धुनें बनाना हराम कैसे

हराम हो बेबस को नचाना
खुद नाच गाना हराम कैसे

गाल बजाना जायज है तो
ढोल बजाना हराम कैसे

आंखें चुराना ग़लत यकीनन
नजरें मिलाना हराम कैसे

कदमों की फितरत थिरकना
फिर चहचहाना हराम कैसे

 

Sunday, December 30, 2012

दर्द के दोहे

दिसम्बर जाते जाते बहुत जख्म दे गया। नए साल का स्वागत करने के लिए मेरे पास सिर्फ दर्द के दोहे ही हैं। जुल्म की शिकार उस अनाम लड़की को हम दर्द के सिवा कुछ नहीं दे पाए। क्या वक्त हमें माफ कर पाएगा?

फिर वहशत के सामने टूट गई उम्मीद
देश जगाकर सो गई बिटिया गहरी नींद

देह में गहरे घाव थे, दिल था लहूलुहान
हैवानों से जूझती, कब तक नाजुक जान

अबके दब पाई नहीं, उस लड़की की आह
जुल्म के नंगे नाच का, सड़कें बनी गवाह

वह लड़की बेनाम सी, बन गई बड़ी मिसाल
सड़क पे उतरे लोग फिर गुस्से में हो लाल

दिल में सबके आग थी, आंखें थीं अंगार
औरत क्यों सहती रहे, मर्द के अत्याचार

खूब बढ़ी ये गंदगी, कर न पाए साफ
हम भी हैं दोषी बड़े, बिटिया करना माफ

इनको कैसे झेलता यह सारा संसार
इन नामर्दांे के लिए औरत सिर्फ शिकार

मानवता को नोंचते, जुल्मी के नाखून
बस डंडा फटकारता, नपुंसक कानून

सबको आजादी मिली, इतना रहा मलाल
औरत कब आजाद हुई, भारत मां बेहाल

शोकाकुल हैं लोग सब, सदमे में है देश
जाते जाते दे गई सबको बिटिया संदेश

दुनिया सुंदर है बहुत, वहशी आंखें खोल
हमला मत कर किसी पर आजादी अनमोल

 

Wednesday, December 12, 2012

घनघोर तरक्की

महंगाई की बन गई है सिरमोर तरक्की
क्या खूब हुई देश की घनघोर तरक्की

शातिरों ने पैसे को पावर में जो बदला
क्या हो गई है और सीनाजोर तरक्की

आगे जो बढ़ना है तो फिर दाम चुकाओ
जाने कहां ले जाएगी घुसखोर तरक्की

घर गया, जमीन गई, गांव भी गया
सुख चैन तक तो ले उड़ी ये चोर तरक्की

कुछ हुए अमीर, कई हो गए कंगाल
कितनों को भरमाये है चितचोर तरक्की

अफसर अगर चाटेंगे चापलूसी की चटनी
पा जाएंगे जल्दी ही चुगलखोर तरक्की

कुछ लोग है विकास की ही चाशनी में तर
गंावों के किनारे खड़ी कमजोर तरक्की

न जाने कभी आएगा क्या ऐसा जमाना
उस ओर तरक्की हो तो इस ओर तरक्की

Monday, November 19, 2012

कौन बुरा है, अच्छा कौन

कौन बुरा है, अच्छा कौन
अपनी धुन का पक्का कौन

दुनिया इक बाजार है प्यारे
सब महंगे हैं, सस्ता कौन

आंखों पर जो पड़ा हुआ है
यार हटाए पर्दा कौन

सारी जनता को मालूम है
नेता और उचक्का कौन

हम झूठों की नगरी में ही
खोज रहे हैं सच्चा कौन

जिसने थामा, याद रहा
मगर दे गया धक्का कौन
सुनने वाले कबके सो गए
और सुनाए किस्सा कौन

शहर में जा अंकल बन बैठे
भूले गांव का कक्का कौन

रंगी सियासत सब जाने है
कौन मशीन है, पुर्जा कौन

कौन उठाता है दीवारें
और बनाए रस्ता कौन

साबित तो करना ही होगा
कौन है जि़न्दा, मुर्दा कौन

Thursday, October 18, 2012

कतरा कतरा जिंदगी लगे

इन दिनों सिर्फ दर्द का दरिया ही है। डुबकी लगाते रहिए या डूब कर मर जाइए। बीते दिनों बहुत कुछ लिखा गया, यात्राएं हुईं,  मगर इस दिल को तसल्ली न हुई। दर्द कुछ ऐसे बयान होता है -

कतरा कतरा जिंदगी लगे
दर्द की तन्हा नदी लगे

मेहमान बनके आई है खुशी
और उधार की हंसी लगे

अपने से लगें ये अंधेरे
क्यों पराई रोशनी लगे

ढह गए यकीन के किले
दिलफरेब आशिकी लगे

है वही जमीन ओ आस्मां
बदला बदला आदमी लगे

झूठ और गवाह पर टिका
इंसाफ भी तेरा ठगी लगे

पीछा करना भी ख्वाब का
क्यों उन्हें आवारगी लगे

सहमा सहमा सा है ये समा
और उदास चांदनी लगे

तेरी रहनुमाई भी कमाल
रहबरी भी राहजनी लगे

झूठ बोलना गुनाह है
सच कहूं तो दिल्लगी लगे

मुझको देगा क्या खुदा पनाह
उसमें भी तो पैरवी लगे

Wednesday, August 1, 2012

रेंजलाल

पिछले दिनों अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाया। रोहित शेखर नाम के एक नौजवान के नाजायज बाप का पता चल गया जो देश का एक बड़ा राजनेता हैं। डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट नहीं बदली और साबित हो गया कि नाजायज बाप कौन है। लेकिन रेंजलाल की किस्मत ऐसी नहीं है। उसकी मां ने लंबी लड़ाई लड़ी और हार गई। वह एक आदिवासी औरत  है इसलिए उसके बच्चे के नाजायज बाप ने डीएनए रिपोर्ट बदलवा दी। लेकिन पूरा गांव जानता है कि रेंजलाल का नाजायज बाप कौन है इसलिए तो उन्होंने इसका नाम रेंजलाल रखा क्योंकि उसका नाजायज बाप एक रेंजर है। सबसे पहले यह कहानी केसला में समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय महासचिव सुनील ने सुनाई। फिर वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता बाबा मायाराम के साथ हम विस्थापित बोरी गांव पहुंचे और रघुवती से मिले। यह सच्ची कहानी देश की न्याय व्यवस्था की पोल खोल देती है।
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रघुवती बाई के चेहरे पर थकान नजर आती है। बुझी-बुझी सी आंखें, जैसे कहीं शून्य में खोई रहती हैं। मानो उदासी ने वहां घर बना लिया हो। हमेशा काम में जुटी रहती है, लगातार। मां है तो सहारा है। नई बोरी में भी करने को बहुत कुछ है। घर और खेती जमाने में ही सारा दिन निकल जाता है। जितनी जरूरत हो, उतना ही बोलती है। ज्यादातर समय चुप ही रहती है।

क्या रघुवती हमेशा से ऐसी ही है या रेंजलाल के जाने से दुखी है। बताने लगी ‘ रेंजलाल यहां आवारा हो गया था। घूमते रहता था इसलिए उसे छात्रावास में भेज दिया। कुछ तो पढ़ेगा। कहकर रघुवती फिर उदास हो जाती है।

रघुवती कहे भी तो क्या? उसका दर्द जैसे उसके चेहरे पर उतर आता है। कई बातें शब्दों में नहीं कही जा सकती। कई बार एक चुप्पी भी बहुत कुछ कह देती है। रघुवती आज तक खुद को माफ नहीं कर पाई है। आखिर कैसे वह एक रेंजर की वहशी दबंगता के आगे तार-तार हो गई। क्यों नहीं पहले ही दिन उसने रेंजर के मुंह पर साफ कह दिया होता। जो लड़ाई बाद में लड़कर वह हार गई, अगर पहले ही लड़ी होती तो आज..। रघुवती सिहर उठती है। हे खैरा माई मुझे उठा क्यों न लिया उसी समय।

तभी अचानक उसके भीतर से ही एक आवाज आती है ‘अम्मां, मुझे भूल गई क्या?’ अरे यह तो रेंजलाल है। रघुवती के चेहरे पर बसी उदासी में जैसे ममता ने सेंध लगा दी। यह रेंजलाल ही तो है, जिसके लिए वह आठ साल तक लड़ती रही। कितनी चिट्ठी पत्री, कितने कागज, कितनी जांच और हुआ क्या?

रेंजलाल को उसके पिता का नाम नहीं मिला। वह तो सिर्फ अपनी मां का बेटा है और वह इस कोरकू आदिवासी समाज का भी है जिसने उसे अपने दिल में जगह दी। रेंजलाल भी यह जानता है। वह कहता भी है, अब मैं छोटा पप्पू नहीं हूं।

रघुवती को इसलिए खाली बैठना पसंद नहीं है। कुछ करते रहो तो मन लगा रहता है। हाथ को कोई काम न हो तो जाने क्या-क्या सोचने लगती है। गुजरी हुई कितनी ही घटनाएं किसी चुड़ैल की तरह उसके पीछे ही खड़ी रहती हैं। जैसे ही वह खाली होती है, वे उस पर टूट पड़ती हैं और फिर तो गुजरे जमाने की एक-एक चोट जैसे हरी हो जाती है। जख्मों के टांके खुल जाते हैं और उनमें दर्द बाहर बहने लगता है।

रघुवती की आंखें छलछला जाती हैं। वह गुस्से से सिहर उठती है। एक दबंग रेंजर ने उसे मां बना दिया। हर कदम पर उसे लड़ना और हारना पड़ा। और एक दिन वे फिर आए। कई बड़े साहब लोग। उसे एक जगह ले गए। कोर्ट कचहरी या कोई दफ्तर जाने कहां। एक लड़का भी साथ था। थोड़ी सी लिखा-पढ़ी हुई। उस लड़के को कुछ पैसे दिए। कहते हैं कि उसे 25 हजार रुपए दिए। साहब लोगों ने रघुवती से कहा खुश हो जा तेरी शादी हो गई। रघुवती बस डर और गुस्से से कांपती रही। वह लड़का रुपए लेकर अपने घर चला गया। साहब लोग हंसते हुए गाड़ी में बैठकर निकल गए और रघुवती समझ ही नहीं पाई कि वे लोग उसके साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं।

जब नई बोरी बसी तो सरकार ने पुरानी बोरी के हर वयस्क को पांच एकड़ जमीन और ढाई लाख रुपए नकद दिए, लेकिन रघुवती को कुछ नहीं मिला। सरकारी अफसरों ने कहा रघुवती की शादी हो गई है, उसे मुआवजा नहीं मिलेगा। इतना बड़ा झूठ! रघुवती तो जैसे बर्दाश्त करने के लिए ही पैदा हुई है। क्या करती, कहां जाती। आखिर अपनी मां के साथ नई बोरी आ गई। अब वह अकेली भी नहीं थी। जब नई बोरी आई तो रेंजलाल छोटा  ही था।

कहते हैं न उजड़ने वालों को सहारा देने वाले भी मिल जाते हैं। तभी तो रघुवती जिंदा है और रेंजलाल छात्रावास में पढ़ रहा है। अगर रघुवती हिन्दू समुदाय की होती तो उसके परिजन ही उसे मार डालते और रेंजलाल को पैदा होने का मौका ही नहीं मिलता, लेकिन कोरकू मवासियों में ऐसा नहीं होता। वहां कुंआरी मां की न जिंदगी ली जाती है, न उसे हिकारत की नजर से देखा है। उसे दोबारा जीने का मौका दिया जाता है। चाहे तो रघुवती भी अपनी मर्जी से घर बसा सकती है।

लेकिन रघुवती अब ऐसा कुछ नहीं सोचती। उसने नियति को स्वीकार कर लिया है। उसने सरकारी अफसरों और दूसरे उजले लोगों की ईमानदारी देख ली है। कहते थे कि जांच से सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। वो क्या कहते हैं....डीएनए की जांच होगी और बस रेंजर बच नहीं पाएगा। रेंजलाल की किस्मत संवर जाएगी। किसान आदिवासी संगठन वाले भी आए थे। सुनील भैया ने फोन भी किया था हैदराबाद, जहां जांच होती है। कोई राव साहब थे, कहने लगे रिपोर्ट बदलने या सैंपल बदलने का डर है तो मैं खुद आ जाता हूं। सच कहा था, राव साहब खुद आए थे। उधर, रघुवती निश्चिंत थी कि जांच में सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, लेकिन कमाल देखिए कि खुद राव साहब ने ही रिपोर्ट बदल दी और रेंजर का सैंपल रेंजलाल के सैंपल से मैच नहीं खाया, रेंजर बच गया।

पर रघुवती तो जिंदा थी और उसका बच्चा भी दुनिया में आ चुका था। उस बिना नाम और बिना बाप के बच्चे को गांव के लोगों ने नाम दिया रेंजलाल, क्योंकि वह एक रेंजर की औलाद है। भले ही सफेदपोश लोगों ने झूठ के जीतने की घोषणा कर दी हो, लेकिन रघुवती ही नहीं गांव का बच्चा-बच्चा जानता है कि वह रेंजर का बेटा है। अब रेंजर का बेटा है तो रेंजलाल से बेहतर नाम और क्या हो सकता है, लेकिन बात कहीं ज्यादा गहरी है।

असल में यह है कोरकू समाज के विरोध करने का तरीका। मां और बच्चे की समाज में वही हैसियत है जो पहले थी। उनके पास आजादी से सांस लेने, अपनी बात कहने और जीने का मौका है, लेकिन रेंजलाल नाम देकर जैसे कोरकू समाज ने इस विशाल लोकतंत्र और न्यायपालिका को आइना दिखाने का काम किया है। रेंजलाल नाम रातोंरात पूरे इलाके में मशहूर हो गया। उस दिन बरसों बाद रघुवती मुसकुराई थी और रेंजलाल ऐसे तनकर खड़ा था जैसे पूरी दुनिया को चुनौती दे रहा हो।
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Friday, July 13, 2012

उजड़े गांवों का राग - तीन

विस्‍थापन की दुनिया  - नया धांईं 
क्राय की फेलोशिप विकास, विस्थापन और बचपन के दौरान रोरीघाट, इंदिरानगर और नये धांई की यात्रा की गई। काम के दौरान लिखी डायरी के कुछ पन्ने यहां सबसे साझा कर रहा हूं। प्रस्तुत है संस्मरण की तीसरी किस्त।
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 नये धांई की सच्चाई 
        
माया
नया धांई मुझे कई बातों के लिए याद आएगा। सविता, माया और रवीना जैसी बच्चियां भी बहुत याद आएंगी। ऐसे ही होते हैं आदिवासी जरा देर मेंतीन ही आप उनके घर के सदस्य हो जाते हैं। पांच साल पहले अपना पुराना गांव छोड़कर आए लोगों का स्वभाव अब भी पहाड़ों जैसा ही है सबको अपना बना लेने का। उस शाम मुकेश बहुत परेशान था। कहां रहेंगे, कौन खाने को देगा। कैसे सुबह होगी। वरसों बाद मुकेश पुरोहित मेरे साथ था। नौजवानी में वह हमारी नाटक टीम का हिस्सा था। लेकिन उसे मेरे साथ अजनबी गांव में रात बिताने का मौका नहीं मिला था। फिलहाल वह इंदौर के एक निजी स्कूल में पढ़ाता है। इन दिनों छुट्टियों में पिपरिया आया हुआ था सो मेरे साथ चला आया।

हमने इकराम सिंह के आंगन में बिछे पलंग पर अधिकार जमा लिया था। शाम गहरी  होने लगी। मुकेश चिंता में डूब गया। तभी माया अचानक आई और पूछने लगी ‘अंकल बाटी बना रही हूं। खा लोगे या आपके लिए रोटी बनाऊ। हमने कहा बाटी ही खाएंगे। चौंकने की बारी मुकेश की थी। माया ने अपने पिता के साथ हाथ धुलवा कर खाना खिलाया। दूसरे दिन और गजब हो गया। बिरजूखापा गांव से एक हमारी उम्र का व्यक्ति और एक नौजवान आया। पता चला कि यह माया के होने वाले ससुर और देवर है। माया की शादी तय हो गई। लड़का इंदौर में काम करता है।

उस शाम इकराम सिंह को उनके दोस्त अपने साथ ले गए थे। जब वे लौटे तो जमकर पिये हुए थे। कहने लगे, आपके कारण मैं तीन दिन से पी नहीं रहा था लेकिन आज मेरे दोस्त मुझे खींच ले गए। माया के अंकल कहने पर उन्होंने एतराज किया और मेरी उम्र पूछी। मेरे बताने पर कहने अरे आप तो मुझसे बड़े हैं और यह आपको अंकल कह रही है। बस तभी से माया मुझे ताऊ कहने लगी। उधर उसके पिता ने खाने से पहले हमें महुआ पिलाने की जिद ठान ली। घर में महुआ की शराब नहीं थी इसलिए माया को पड़ोस में भेजा गया और वह जरा देर में ले भी आई। हमें इकराम का साथ देना पड़ा। मैंने माया की शादी के बारे में पूछा तो इकराम कहने लगे मैंने माया से पहले पूछ लिया था। उसे कोई दिक्कत नहीं है, वह राजी है। मैंने माया को देखा वह मुसकुरा रही थी। कहने लगी हां पापा ने पूछा था।

माया तेज लड़की है। उसकी मां बचपन में ही गुजर गई। वह मामा के यहां रही मानसिंहपुरा में। वहीं प्राइमरी तक पढ़ी। फिर नये धांई आ गई। इस साल दसवीं की परीक्षा दी है। मोटरसाइकिल चला लेती है। कहती है उसके बुआ के लड़के ने सिखाई है। उसने सच कहा था कि गांव में कोई  उसकी तरह खुलकर बात नहीं करेगा। माया सीधी बात कहती है। उसने कमजोर शिक्षा के लिए माता-पिता और शिक्षकों को दोषी ठहराया। सविता से उसी ने मिलवाया। छठवीं पढ़ने वाली सविता की शादी तय हो गई है। उसकी पढ़ाई छूट गई। वह बहुत उदास है। बात करने को बिलकुल तैयार नहीं है। माया ने समझाया मैंने भी कोशिश की लेकिन सविता चुप। तब मैंने कहा मैं इतना कर सकता हूं कि एक बार तुम्हारे माता-पिता से बात करूं कि वे तुम्हे पढ़ने का पूरा मौका दें और अभी शादी न करें। इसके बाद सविता ने मेरी तरफ देखा और धीमे से कहा बात जरूर करना। उसने अपनी पढ़ाई और अपने सपने के बारे में बताया। उसकी लिखावट अच्छी है। उसने लिखकर दिया है कि वह पढ़ना चाहती है लेकिन घरवाले उसकी शादी कर रहे हैं जो गलत है।
सविता की मां लक्ष्मी बाई
सविता
वह अपनी मां से परेशान है। सुबह से ही महुआ की शराब पी लेती है। उसके पिता भी पीते हैं। वे कुछ नहीं कहते। इसलिए सविता को अपनी मजदूरी के पैसे भी मां से छिपाने पड़ते हैं। सविता की कहानी मन को दुखी कर देती है। कैसी मासूमियत से उसने बताया था, लड़का अपने पिता के साथ आया था। सविता इतनी दुखी थी कि उसने लड़के को अलग बुलाकर डांटा था और शादी के लिए मना करने को कहा था, लेकिन लड़का मुसकुराता रहा और आखिर में बोला कि मैं मना नहीं करूंगा। मैं तो शादी करूंगा। कहते कहते सविता उदास हो गई। उसे लड़के पर बहुत गुस्सा आया था मगर वह कुछ नहीं कर पाई और इधर मां कहती है कि शादी नहीं करेगी तो मारकर जंगल में फेंक देंगे। अब सविता क्या करे?

इकराम के घर अचानक सविता की मां लक्ष्मी बाई से भेंट हो गई। दिन के 12 बजे थे और वे सचमुच बहुत पिये हुए थीं। उन्होंने कहना शुरू किया तो फिर रुकी नहीं। डिप्टी रेंजर पांडे को खूब गालियां दीं। कहने लगीं -मादरचोद कहता था कि जोतने के लिए बैल देंगे। अब किसकी गांड में घुस गए बैल। लक्ष्मी बाई सचमुच बहुत गुस्से में थी। सरकार ने वादे तो बहुत किए पर बाद आदिवासियों को अकेला छोड़ दिया। ज्यादातर लोगों के लिए गुजर बसर करना भी मुश्किल हो रहा है। पांच एकड़ जमीन तो इन्ह्रंे मिली लेकिन वह इतनी उबड़ खावड़ थी कि खेती करना मुश्किल। लक्ष्मी के पति सुमरन सिंह ने जमीन किराए पर सेमरी के एक पटेल को दे दी और खुद उसके मजदूर बन गए। लक्ष्मी बाई सुमरन से भी बहुत नाराज हैं। वह जुए सट्टे में बबा्र्रदी कर रहा है। सविता की शादी की बात पर वे अडिग थी। हां उसकी शादी करना है। यह साल तो मुश्किल लग रहा है पर अगले साल शुरू में ही उसकी शादी कर दे्रेगे। उन्होंने साफ कहा, अब माहौल नहीं है वैसा कि लड़कियों को पढ़ाओ। जितना पढ़ लिया बहुत है, अब अपने घर पढ़ना। लक्ष्मी बाई से बहस करना आसान नहीं हैं और जब वे भरपूर नशे में हों तो ऐसी हिमाकत करना समझदारी नहीं थी।

रसंती बाई के घर हम कई लोग थे। बाबा मायाराम, राकेश कारपेंटर और तहलका के पत्रकार शिरीष खरे। नये धांई में नदी के न होने से रसंती बाई बहुत दुखी हैं। वे पुरानी धांई के पास बहने वाली सोनभद्रा नदी को याद करती हैं। उनके पति अघन सिंह वहीं पास में बैठे हैं। उनके दो बच्चे आसपास उछलकूद कर रहे हैं। बातचीत रसंती बाई से हो रही है। मेरे बार-बार कहने पर उन्होंने एक गीत सुनाया जिसे वे पुरानी धांई में नदी पर जाते हुए गाती थीं। उन्हें छिंदवाड़ा जाना था इसलिए बात बीच में ही रुक गई। रसंती बाई भी सिर पर लकड़ी का गट्ठा लेकर बेचने जाती हैं। उन्होंने गहरी बात कही  ‘जंगल में जानवर को तो हू हू करके भगा सकते हैं लेकिन आदमी को ऐसे नहीं भगाया जा सकता।’ इसलिए वे समूह में जंगल जाती हैं लकड़ी काटने। यहां औरते सुरक्षित नहीं हैं। उन्हें अपनी आजादी दांव पर लगानी पड़ी है। माया ने भी कहा था कि स्कूली लड़कियों को सेमरी के पटेलों के लड़के छेड़ते हैं। वे भी समूह में स्कूल जाती हैं और लड़कों के मुंह नहीं लगतीं। माया ने कहा था इस साल छह लड़कियों ने आठवीं पास की है लेकिन उनमें एक भी आगे पढ़ने के लिए बाबई नहीं जाएगी। आठवीं तक भी खरदा व आश्रम का स्कूल ही है। वहां तक भी बहुत कम लड़कियां पहुंच पाती हैं।

सुमरन और अघन सिंह के बाद सबसे मुफलिसी की हालत राजेश की है। उसकी नन्ही चार साल की बिटिया रवीना बहुत प्यारी है। उसकी पत्नी और मां भी सिर पर लकड़ी का गट्ठर रखकर सेमरी बेचने जाती हैं। राजेश नए धांई में आकर पछता रहे हैं। उन्हें लगता है इससे बेहतर तो पुराने धांई में थे। यहां पहली उनके घर की औरतों को मूड़ गट्ठा बेचना पड़ रहा है। यहां खेती बिलकुल चैपट है। पानी ही नहीं है। वे बरसात पर ही निर्भर है। उनके खेत की हालत देखकर भी यही लगता है। उनके दोनों बच्चों की मासूमियत खीच लेती है। रवीना बिलकुल चुप है। वह गहरे संकोच में है। जो बातें हो रही हैं उसकी समझ से बाहर हैं। वह सयानेपन के साथ हमारे आसपास ही घूमती रही।
राजेश की चार साल की बिटिया रवीना
8-15 साल के बच्चे अलग ही खेल में मसरूफ़ दिखे। वे सिक्कों पर निशाना साधने का खेल खेल रहे थे। हम अपने बचपन में कंचों पर निशाना लगाया करते थे लेकिन अब नए धांई के बच्चे पैसों पर निशाना साधने लगे हैं। बड़े कस्बे के नजदीक आने के बाद किशोरों के लिए नई दुनिया खुल गई है। वे सेमरी के खूब चक्कर लगाते थे। इकराम ने कहा भी था बच्चों के पास दस रुपए हुए तो वे सेमरी चले जाते हैं। प्राइमरी के बाद ज्यादातर बच्चों के लिए कोई मौके नहीं हैं। उन्हें अपने आसपास से सीखना समझना है। राजकुमार जैसे किशोरों को डर है कि कहीं युवा नशे के चक्कर में न फंस जाएं।        

यह महुआ बीनने का मौसम है। सेमरी के एक पटेल ने इकराम सिंह के यहां कांटा लगा दिया है। वे सीधे महुआ खरीद रहा है और नकद पैसे दे रहा है। वह 12 रुपए किलो महुआ ले रहा है। सब जानते हैं कि बरसात बाद यही महुआ 20-25 रुपए किलो बिकेगा, लेकिन आदिवासी को तो पैसों की जरूरत है इसलिए बहुत से लोग महुआ बेच रहे हैं। रात को लोग दो बजे महुआ बीनने निकलते हैं और दूसरे दिन दोपहर को लौटते हैं। इकराम सिंह के यहां आंगन में महुआ सूख रहा है।

एक दिन अचानक फागराम आ गए। वे मंगल सिंह के गांव से लौट रहे थे। हमारा पता चला था सो मिलने चले आए। फागराम समाजवादी जन परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता है। किसान आदिवासी संगठन के नेता है और जनपद सदस्य है। इकराम सिंह का बेटा कमलेश उन्हें जानता है। वहीं आंगन में कुछ देर हमने बातचीत की। उसके बाद फागराम अपनी बाइक से रवाना हुए। और मैं भी नये धांई की बहुत सी यादे लेकर लौटा।
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Monday, June 25, 2012

उजड़े गांवों का राग - दो

(क्राय की फेलोशिप विकास, विस्थापन और बचपन के दौरान रोरीघाट, इंदिरानगर और नये धांई की यात्रा की गई। काम के दौरान लिखी डायरी के कुछ पन्ने यहां सबसे साझा कर रहा हूं। प्रस्तुत है संस्मरण की दूसरी किस्त)

इंदिरानगर में मृत्यु उत्सव

        इंदिरानगर, न नगर है न गांव, वह तो विस्थापितों का एक मोहल्ला भर है। वहां पर होशंगाबाद और छिंदवाड़ा जिले के कई दुखियारों ने पनाह ली। सब रोजी रोटी की तलाश में भटकते हुए आए और यहां बस गए। रोरीघाट के तीन परिवारों ने भी यहीं पनाह ली और 1981 में नीमघान से भगाए गए आदिवासियांे को भी यहां ठिकाना मिला। बाद में इन सबको इंदिरा आवास योजना के तहत मकान के लिए 15 सौ रुपए मिले तो इसका नाम इंदिरानगर हो गया। इस बात को जमाना बीत गया लेकिन इंदिरानगर अनहोनी गांव का एक टोला ही बना रहा। अपने गांव से इस टोले की दूरी तीन किलोमीटर है।
        नीमघान के आठ परिवार अब भी इंदिरानगर में हैं। 1981-82 में जब सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के चलते नीमघान उजड़ा तो 150 घरों का गांव बिखर गया। लोगों को जबरन भगाया गया बिना किसी पुनर्वास के। तब 30-40 परिवार इंदिरानगर आ गए थे और दूसरे कई गांवों में बस गए, नांदिया, घोड़ानार, डापका, बिरजूढाना आदि। लखन दादा कुछ परिवारों के साथ इंदिरानगर में ही डटे रहे। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें राजस्व विभाग ने जमीन दी। आज उनके तीनों बेटों के पास पांच-पांच एकड़ जमीन है। इंदिरानगर में सभी के पास एक-दो एकड़ जमीन है। जो उन्हें बहुत बाद में राजस्व विभाग की मेहरबानी से मिली। दूसरी सुविधाओं ंमें एक प्राइमरी स्कूल और तीन सरकारी नलकूप, तीन-चार हैंडपंप और बस। देखकर ही लगता है प्रशासन ने इस गांव की सुध नहीं ली है।
        लखन दादा से बहुत बात हुई। उन्हें अपना पुराना गांव नीमघान सबसे ज्यादा याद था। वे उन अंतिम लोगों में से थे जिन्हें वन विभाग ने घरों में आग लगाकर भगाया था। तीन अप्रैल 2011 की वह यादगार दोपहर मैंने झोपड़े के पीछे खेत में लखन दादा के साथ गुजारी थी। उनकी हालत जर्जर थी। वे बीमार थे। खेत में टपरिया डाले चारपाई पर बैठे थे। उनके एक पैर में तकलीफ थी। उन्होंने उस पैर को रस्सी से बांधकर एक लकड़ी के सहारे लटका रखा था। अजीब दृश्य था। ऐसे पैर बांधकर लटकाने से उन्हें आराम मिल रहा था। मैंने कुछ फोटो भी लीं लेकिन उन्हें एकलव्य के कम्प्यूटर में सेव करना महंगा पड़ गया। तकनीकी  खराबी से सारी फोटो बेकार हो गईं।
        तकलीफ में भी नीमघान के नाम से जैसे लखन दादा खिल उठे। वे देर तक नीमघान के उजड़ने की कहानी सुनाते रहे। वन विभाग से लेकर राजस्व विभाग तक वे कई अधिकारियों से कई बार मिले। उनकी भागदौड़ का फायदा पूरे इंदिरानगर को मिला। आज सबके पास कुछ जमीन है। मैं मंत्रमुग्ध होकर उस बुजुर्ग से किस्से सुनता रहा। उनके बड़े बेटे जबर सिंह और पिपरिया के मित्र मायाराम भी साथ थे।
         लखन दादा शहद तोड़ने मे उस्ताद थे। उन्होंने सतपुड़ा की ऊंची चट्टानों से भी शहद के छत्ते तोड़े हैं जहां जाने की दूसरे सोच भी नहीं पाते। देर तक हम उन्हें सुनते रहे। वे थक गए थे। पैर बहुत दर्द कर रहा था। मैं सोच रहा था एक-दो मुलाकात और हो जाए तो मजा आ जाएगा। पर इसके लिए उनके स्वस्थ होने का इंतजार करना था, लेकिन खबर मिली की दूसरे दिन यानी चार अप्रैल2011 को ही ल खन दादा ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
         यह अजीब संयोग था कि मुझे लखन दादा की मौत के बाद के कार्यक्रमों में शामिल होने का मौका मिला। यह सुन रखा था कि कोरकू समाज मृत्यु उत्सव मनाता है। सब मिलकर पीते-खाते और नाचते-गाते हैं, लेकिन कभी नजदीक से कोरकू समाज की इस रस्म को देखने का मौका नहीं मिला था। जैसे हिन्दुओं में मौत के बाद 11वीं पर खाना खिलाते हैं। लखन दादा की ग्यारहवीं भी हुई। हमने भी खाया। उसके दूसरे दिन ‘गाता’ कार्यक्रम हुआ जिसे जागर भी कहा जाता है। यह कोरकू समाज की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है। इसमें लोग जरूर पहुंचते हैं। कुल मिलाकर चार-पांच दिन तक यह मृत्यु उत्सव चलता है।
        जबर सिंह ने अपने दो छोटे भाइयों के साथ मिलकर पूरे कार्यक्रम को आयोजित किया था। करीब 20 गांवों के सौ-डेढ सौ लोग इंदिरानगर मंे मौजूद थे। हमने देर तक गाता को गाते-नाचते देखा-सुना। ढोल बाजों के साथ औरत-मर्द सब झूमकर नाच-गा रहे थे। सबने महुआ की शराब छान रखी थी। युवा भी झूम रहे थे और वृद्ध भी। बीच में भोजन भी हुआ जिसमें गोश्त का एक सूखा टुकड़ा भी मिला। फिर नाच-गाना शुरू हो गया।
       सागौन के पटिए पर सूर्य-चद्र और मृत आत्मा के चित्र उकेरे गए थे। उसे एक कपड़े में बांधा गया था। पटिए और कपड़े पर हल्दी लगी थी। एक ग्रामीण उसे अपने कंधे पर लेकर झूम रहा था। बीच में दो बाजे वाले बजा रहे थे और आदिवासी स्त्री-पुरुष गोल घेरे में नाच रहे थे। उनके गीतों में जीवन और मौत का दर्शन था तो जीवन के आनंद की धमक भी थी। पूरे दिन में उन्हें नाचते देखता रहा। नाच इतना तेज था कि कल एक ढोलक टूट गई। अब तक दो ढोल टूट चुके हैं। शराब के बारे में कहा गया कि कमी नहीं होने दी जाएगी। कल रात से लोग नाच रहे हैं और पी रहे हैं। गांव में करीब सौ-डेढ़ सौ लोगों का जमावड़ा था।
सागौन के पटिए पर सूर्य-चद्र और मृत आत्मा के चित्र उकेरे गए हैं।
गाता का एक गीत 
ये जिंदगानी माटी पुतला
पानी गिरे घुल जाएंगे
ये जिंदगानी कागज का पुतला
पानी गिरे गल जाएंगे
       शाम को सब लोग नाचते गाते गांव के बाहर महुआ के पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां पटिए को पेड़ से टिकाकर रख दिया गया। लोग उस पर महुआ छिड़क रहे थे। उसी वक्त मैंने लखन दादा की बेटी को रोते हुए देखा। मुझे पहला कोई व्यक्ति मिला जिसकी आंखों में आंसू थे वर्ना यहां तो सभी झूम रहे हैं और नाच-गा रहे हैं। दूर से कोई शादी का जश्न समझ सकता है लेकिन यह गाता है। बैतूल में कोरकू इसे जागर कहते हैं। 
         रात भर के लिए उस पटिए को महुआ के पेड़ के ऊपर रख दिया। सुबह सब लोग इसे लेकर पगारा रवाना होंगे। पगारा पचमढ़ी के पास है। वहां एक पेड़ के नीचे इस इलाके के कोरकू मृत आत्मा के नाम का सागोन का पटिया गाड़ देते हैं।
अलविदा लखन दादा
          जबर सिंह ने बताया सुबह सब लोग पैदल पगारा जाएंगे। जो यहां से करीब 30-35 किलोमीटर पड़ेगा। उसके बाद शाम तक सब वापस आ जाएंगे। इस तरह मौत के बाद का उत्सव चार-पांच दिन तक चलता है। इसमें समाज के सभी लोगों का आना अनिवार्य है। जबर सिंह ने बताया करीब तीस हजार का खर्चा आया है।
            इंदिरानगर में गाता कार्यक्रम को देखकर मन हल्का हो गया। विस्थापन के बाद भी इंदिरानगर के कोरकू अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोये हुए हैं। अपनी जड़ों से उखड़ने के बाद ‘गाता’ उन्हें एक दूसरे से जोड़े हुए है।  


          
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