Monday, June 25, 2012

उजड़े गांवों का राग - दो

(क्राय की फेलोशिप विकास, विस्थापन और बचपन के दौरान रोरीघाट, इंदिरानगर और नये धांई की यात्रा की गई। काम के दौरान लिखी डायरी के कुछ पन्ने यहां सबसे साझा कर रहा हूं। प्रस्तुत है संस्मरण की दूसरी किस्त)

इंदिरानगर में मृत्यु उत्सव

        इंदिरानगर, न नगर है न गांव, वह तो विस्थापितों का एक मोहल्ला भर है। वहां पर होशंगाबाद और छिंदवाड़ा जिले के कई दुखियारों ने पनाह ली। सब रोजी रोटी की तलाश में भटकते हुए आए और यहां बस गए। रोरीघाट के तीन परिवारों ने भी यहीं पनाह ली और 1981 में नीमघान से भगाए गए आदिवासियांे को भी यहां ठिकाना मिला। बाद में इन सबको इंदिरा आवास योजना के तहत मकान के लिए 15 सौ रुपए मिले तो इसका नाम इंदिरानगर हो गया। इस बात को जमाना बीत गया लेकिन इंदिरानगर अनहोनी गांव का एक टोला ही बना रहा। अपने गांव से इस टोले की दूरी तीन किलोमीटर है।
        नीमघान के आठ परिवार अब भी इंदिरानगर में हैं। 1981-82 में जब सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के चलते नीमघान उजड़ा तो 150 घरों का गांव बिखर गया। लोगों को जबरन भगाया गया बिना किसी पुनर्वास के। तब 30-40 परिवार इंदिरानगर आ गए थे और दूसरे कई गांवों में बस गए, नांदिया, घोड़ानार, डापका, बिरजूढाना आदि। लखन दादा कुछ परिवारों के साथ इंदिरानगर में ही डटे रहे। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें राजस्व विभाग ने जमीन दी। आज उनके तीनों बेटों के पास पांच-पांच एकड़ जमीन है। इंदिरानगर में सभी के पास एक-दो एकड़ जमीन है। जो उन्हें बहुत बाद में राजस्व विभाग की मेहरबानी से मिली। दूसरी सुविधाओं ंमें एक प्राइमरी स्कूल और तीन सरकारी नलकूप, तीन-चार हैंडपंप और बस। देखकर ही लगता है प्रशासन ने इस गांव की सुध नहीं ली है।
        लखन दादा से बहुत बात हुई। उन्हें अपना पुराना गांव नीमघान सबसे ज्यादा याद था। वे उन अंतिम लोगों में से थे जिन्हें वन विभाग ने घरों में आग लगाकर भगाया था। तीन अप्रैल 2011 की वह यादगार दोपहर मैंने झोपड़े के पीछे खेत में लखन दादा के साथ गुजारी थी। उनकी हालत जर्जर थी। वे बीमार थे। खेत में टपरिया डाले चारपाई पर बैठे थे। उनके एक पैर में तकलीफ थी। उन्होंने उस पैर को रस्सी से बांधकर एक लकड़ी के सहारे लटका रखा था। अजीब दृश्य था। ऐसे पैर बांधकर लटकाने से उन्हें आराम मिल रहा था। मैंने कुछ फोटो भी लीं लेकिन उन्हें एकलव्य के कम्प्यूटर में सेव करना महंगा पड़ गया। तकनीकी  खराबी से सारी फोटो बेकार हो गईं।
        तकलीफ में भी नीमघान के नाम से जैसे लखन दादा खिल उठे। वे देर तक नीमघान के उजड़ने की कहानी सुनाते रहे। वन विभाग से लेकर राजस्व विभाग तक वे कई अधिकारियों से कई बार मिले। उनकी भागदौड़ का फायदा पूरे इंदिरानगर को मिला। आज सबके पास कुछ जमीन है। मैं मंत्रमुग्ध होकर उस बुजुर्ग से किस्से सुनता रहा। उनके बड़े बेटे जबर सिंह और पिपरिया के मित्र मायाराम भी साथ थे।
         लखन दादा शहद तोड़ने मे उस्ताद थे। उन्होंने सतपुड़ा की ऊंची चट्टानों से भी शहद के छत्ते तोड़े हैं जहां जाने की दूसरे सोच भी नहीं पाते। देर तक हम उन्हें सुनते रहे। वे थक गए थे। पैर बहुत दर्द कर रहा था। मैं सोच रहा था एक-दो मुलाकात और हो जाए तो मजा आ जाएगा। पर इसके लिए उनके स्वस्थ होने का इंतजार करना था, लेकिन खबर मिली की दूसरे दिन यानी चार अप्रैल2011 को ही ल खन दादा ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
         यह अजीब संयोग था कि मुझे लखन दादा की मौत के बाद के कार्यक्रमों में शामिल होने का मौका मिला। यह सुन रखा था कि कोरकू समाज मृत्यु उत्सव मनाता है। सब मिलकर पीते-खाते और नाचते-गाते हैं, लेकिन कभी नजदीक से कोरकू समाज की इस रस्म को देखने का मौका नहीं मिला था। जैसे हिन्दुओं में मौत के बाद 11वीं पर खाना खिलाते हैं। लखन दादा की ग्यारहवीं भी हुई। हमने भी खाया। उसके दूसरे दिन ‘गाता’ कार्यक्रम हुआ जिसे जागर भी कहा जाता है। यह कोरकू समाज की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है। इसमें लोग जरूर पहुंचते हैं। कुल मिलाकर चार-पांच दिन तक यह मृत्यु उत्सव चलता है।
        जबर सिंह ने अपने दो छोटे भाइयों के साथ मिलकर पूरे कार्यक्रम को आयोजित किया था। करीब 20 गांवों के सौ-डेढ सौ लोग इंदिरानगर मंे मौजूद थे। हमने देर तक गाता को गाते-नाचते देखा-सुना। ढोल बाजों के साथ औरत-मर्द सब झूमकर नाच-गा रहे थे। सबने महुआ की शराब छान रखी थी। युवा भी झूम रहे थे और वृद्ध भी। बीच में भोजन भी हुआ जिसमें गोश्त का एक सूखा टुकड़ा भी मिला। फिर नाच-गाना शुरू हो गया।
       सागौन के पटिए पर सूर्य-चद्र और मृत आत्मा के चित्र उकेरे गए थे। उसे एक कपड़े में बांधा गया था। पटिए और कपड़े पर हल्दी लगी थी। एक ग्रामीण उसे अपने कंधे पर लेकर झूम रहा था। बीच में दो बाजे वाले बजा रहे थे और आदिवासी स्त्री-पुरुष गोल घेरे में नाच रहे थे। उनके गीतों में जीवन और मौत का दर्शन था तो जीवन के आनंद की धमक भी थी। पूरे दिन में उन्हें नाचते देखता रहा। नाच इतना तेज था कि कल एक ढोलक टूट गई। अब तक दो ढोल टूट चुके हैं। शराब के बारे में कहा गया कि कमी नहीं होने दी जाएगी। कल रात से लोग नाच रहे हैं और पी रहे हैं। गांव में करीब सौ-डेढ़ सौ लोगों का जमावड़ा था।
सागौन के पटिए पर सूर्य-चद्र और मृत आत्मा के चित्र उकेरे गए हैं।
गाता का एक गीत 
ये जिंदगानी माटी पुतला
पानी गिरे घुल जाएंगे
ये जिंदगानी कागज का पुतला
पानी गिरे गल जाएंगे
       शाम को सब लोग नाचते गाते गांव के बाहर महुआ के पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां पटिए को पेड़ से टिकाकर रख दिया गया। लोग उस पर महुआ छिड़क रहे थे। उसी वक्त मैंने लखन दादा की बेटी को रोते हुए देखा। मुझे पहला कोई व्यक्ति मिला जिसकी आंखों में आंसू थे वर्ना यहां तो सभी झूम रहे हैं और नाच-गा रहे हैं। दूर से कोई शादी का जश्न समझ सकता है लेकिन यह गाता है। बैतूल में कोरकू इसे जागर कहते हैं। 
         रात भर के लिए उस पटिए को महुआ के पेड़ के ऊपर रख दिया। सुबह सब लोग इसे लेकर पगारा रवाना होंगे। पगारा पचमढ़ी के पास है। वहां एक पेड़ के नीचे इस इलाके के कोरकू मृत आत्मा के नाम का सागोन का पटिया गाड़ देते हैं।
अलविदा लखन दादा
          जबर सिंह ने बताया सुबह सब लोग पैदल पगारा जाएंगे। जो यहां से करीब 30-35 किलोमीटर पड़ेगा। उसके बाद शाम तक सब वापस आ जाएंगे। इस तरह मौत के बाद का उत्सव चार-पांच दिन तक चलता है। इसमें समाज के सभी लोगों का आना अनिवार्य है। जबर सिंह ने बताया करीब तीस हजार का खर्चा आया है।
            इंदिरानगर में गाता कार्यक्रम को देखकर मन हल्का हो गया। विस्थापन के बाद भी इंदिरानगर के कोरकू अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोये हुए हैं। अपनी जड़ों से उखड़ने के बाद ‘गाता’ उन्हें एक दूसरे से जोड़े हुए है।  


          

Wednesday, June 6, 2012

उजड़े गांवों का राग-एक

(क्राय की फेलोशिप के तहत विकास, विस्थापन और बचपन पर होशंगाबाद जिले के तीन गांवों में अध्ययन किया गया रोरीघाट, इंदिरानगर और नया धांई। रोरीघाट अभी विस्थापित नहीं हुआ है पर 30 साल से विस्थापन की राह देख रहा है। गांवों की यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी के कुछ पन्ने यहां आप सब से साझा करना चाहता हूं। प्रस्तुत है संस्मरण की पहली किस्त)

तब से अब तक रोरीघाट

        रोरीघाट जाते हुए सचमुच में मैं रोमांचित था। इतने बरसों बाद फिर उस गांव की यात्रा। रोरीघाट में 1981-82 में बहुत समय गुजरा है। उन दिनों की डायरी ने हमेशा मेरी स्मृतियों में इस गांव को ताजा रखा। हर माह एक हफ्ता, साल भर तक। वह मेरी उम्र का 25वां साल था। जंगल-पहाड़ और आदिवासियांे के जीवन में झांकने का पहला मौका। किशोर भारती के एक शोध अध्ययन कार्यक्रम के तहत यह यात्राएं की गई थीं। इसका नेतृत्व इलीना सेन कर रही थीं। 29 साल बाद क्राय की फेलोशिप ने एक बार फिर रोरीघाट जाने का मौका दे दिया। सचमुच यह सपने जैसा लग रहा था। श्रीगोपाल की बाइक के पीछे बैठा में जैसे सतपुड़ा के जंगलों में खो गया था।
         उस जमाने में गांव के एक बुजुर्ग परसन सिंह जिन्हें नेत्रहीन होने के कारण सब सूरदास कहते थे, मैं उनके झोपड़े में ठहरता था। बीच में हमेशा अलाव जलता रहता था। उसी में मैं अपना और सूरदास का खाना बनाता था। सुबह-शाम आदिवासियों से चर्चा होती और दोपहर को मैं सतपुड़ा के जंगलों की खाक छानता रहता।  पहली बार इलीना सेन के साथ जीप से गांव तक गए थे। उसके बाद साल भर तक पचमढ़ी से पैदल आना-जाना ही हुआ। रास्ते में तुलतुला पड़ता था। वहां चट्टान से पानी रिसता था और नीचे कटोरेनुमा चट्टान के टुकड़े में भर जाता था। राहगीर उसी से पानी पीते थे। वे पत्तों से गिलास का काम लेते।
         श्रीगोपाल ने बताया उस तुलतुले से ही सिद्धबाबा तक पानी पहुंचाया गया है। सिद्धबाबा एक ऊंची पहाड़ी पर है। वहां वन विभाग की चैकी है। हमारी बाइक जिन रास्तों पर गुजर रही थी वहां बाइक चलाना सचमुच बड़ी बात थी। ऊबड़ खाबड़ पंगडंडी, कहीं-कहीं तो जैसे रास्ते में चट्टानें ही उग आई हों। पचमढ़ी से सीधा उतार। कितने ही पहाड़ों की चोटी पर खड़े होकर हमने रोरीघाट को देखा। बरसों पुराना गांव, वैसे ही पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ।
        आज के रोरीघाट में कदम रखते हुए पुराने दिनों की स्मृतियां ताजा हो गईं। वहीं पथरीली राह, चार मोहल्ले और नई बात सभी मोहल्लों में सोलर लाइट, घर में भी और हर मोहल्ले में एक रास्ते पर। बड़ाढाना में अब पहाड़ी झरने चवनार से पानी आ गया है। दूसरे मोहल्ले वाले अब भी नदी से ही पानी लाते हैं। चवनार पहाड़ी पर हमने कई दोपहर गुजारी हैं। कुछ लिखते पढ़ते या अपनी डायरी ही पूरी करते और झरने में जमकर नहाते। होशंगाबाद के हमारे मित्र सुशील जोशी ने भी उस झरने में खूब नहाया है। उन दिनों कई दोस्तों ने मेरे साथ रोरीघाट की यात्रा की है, अशेष, अरविंद सरदाना,  मीरा, सुशील जोशी, जोगेन सेनगुप्ता, रामवचन दुबे आदि। थोड़ी देर तक तो जैसे मैं नए रोरीघाट में पुराने को ढूंढते रहा। गांव का स्कूल और आंगनबाड़ी दूर से दिखाई देते हैं।
      हम पहंुचे तो गांव सूना लगा। गुरुवार को पचमढ़ी में बाजार लगता है और रोरीघाट के लोग  पचमढ़ी गए हुए थे। सम्मर सिंह अपनी झोपड़ी में मिले। उनसे घुलने-मिलने में ज्यादा देर नहीं लगी। जब मैंने तार सिंह दादा के बारे में पूछा तो वे बोले तार सिंह मेरे दादा थे। मेरी डायरी में तार सिंह से लंबी बातचीत दर्ज है। लेकिन सम्मर सिंह को मैं नही पहचान पाया। सम्मर सिंह बोले मैं अपने दादा से बहुत डरता था। वे जहां होते थे वहां फटकता भी नहीं था इसलिए उस समय आपसे सामना नहीं हो पाया होगा। सम्मर सिंह के साथ उनकी बेटी और दामाद भी रहते हैं। उनके बच्चे हमारे आसपास घूमते रहे। मीना सम्मर सिंह की बेटी है। पांचवीं में पढ़ती है। उसी ने हमारे खाने-पीने की व्यवस्था की।

पुरानी डायरी में तार सिंह दादा
‘शाम तक पांच परिवारों के उनके कामधंधे को लेकर बातचीत हुई। इन्हीं में से एक हैं तार सिंह, उनकी उम्र 75 साल के लगभग है। एक पैर से अपंग हैं। कान में पीतल का बड़ा सा छल्ला डाले हैं। यहां के इतिहास को कुरेदते हुए उन्होंने राजा बलवंत सिंह का नाम बताया। जो पहले पचमढ़ी का कोरकू आदिवासी राजा था। उसके राज्य में 52 गांव थे। बाद में अंग्रेजों ने उससे पचमढ़ी छीन ली और पांच गांव दे दिए, रोरीघाट, काजीघाट, चूरनी, घुटकेरा और नादिया। यह नाम परसन सिंह ने बताए। बलवंत सिंह शिव का भक्त था। अंग्रेजों ने इस इलाके में खूब शिकार किया है और अच्छी बख्शीश के बदले आदिवासियों की खूब सेवा ली है। तार सिंह ने यह सब अपनी आंखों से देखा है। अंग्रेज गांव से अलग रहते थे और उनकी मेम उनसे अच्छा निशाना साध लेती थी।’
                                                                                                                                   
 22 नवम्बर 1981

           सम्मर सिंह से मैंने इकतार सिंह और रोनी बाई के बारे में पूछा, उनकी बेटी सुनीता। पता चला अब उनके परिवार में कोई नहीं हैं। अतर सिंह नाम के जिस बच्चे के साथ मैंने जंगल के खेत पर मचान में रात बिताई थी, वह बालक भी नहीं है। उसकी बीमारी में मौत हुई। कितने ही लोग उस जमाने के अब नहीं है। सम्मर सिंह ने बताया सूरदास का झोपड़ा कुछ आगे था जहां अब भी खाली जगह पड़ी है। उनके पोते दुलार और अधार ने भी बरसों पहले रोरीघाट छोड़ दिया। वे चाटुआचांदकाल गांव में बस गए। उस परिवार का अब कोई भी यहां नहीं है। कैलाश का जवान बेटा भी बीमारी में चल बसा। 15 दिन पचमढ़ी के अस्पताल में भर्ती भी रहा। कैलाश को पता ही नहीं है कि किस बीमारी से उसकी मौत हुई।
         श्यामलाल दादा की भी मौत हो गई। मेरी याददाश्त में श्यामलाल वह नौजवान है जिसने उस साल जंगल से सबसे ज्यादा रामबुहारी तोड़ी थी। उस नौजवान को ही आज की पीढ़ी श्याम दादा कहा रह रही थी। उनकी बेटी सरस्वती से मुलाकात हुई। सरस्वती सातवीं में पचमढ़ी छात्रावास मे रहकर पढ़़ाई करती है। वह श्यामलाल के बड़े बेटे रामप्रकाश के साथ रहती है। उनके तीन बेटे हैं। देखने-सुनने में बीमारियों से मौतों की बात सामने आ रही है। श्याम दादा की मौत टीबी से हो चुकी है। सुनने में आया है कि गांव में टीबी के दो-चार मरीज हैं लेकिन न वे जागरूक हैं और न व्यवस्था ही संवेदनशील है। 
          और फिर आए कुंजीलाल। वे मुझे पहचान गए। जब बात चली तो उन्हें बहुत कुछ याद आ गया। उन्हें सूरदास के घर में चलने वाले स्कूल की याद थी। तब हुआ यह था कि होशंगाबाद के जिला शिक्षा अधिकारी बशीर साहब ने कुंजीलाल से कहा था वह गांव के बच्चों को पढ़ाए उसे पक्का कर देंगे। कुछ महीने सूरदास के झोपड़े में स्कूल चला। बाद में साहब ने कुछ नहीं किया और कुंजीलाल ने पढ़ाना छोड दिया। कुंजीलाल ने बताया कि कितने ही लोग बीमारी और हादसों में चल बसे। गांव वालों की जिंदगी में कुछ खास फर्क नहीं पड़ा है। खेती वैसे ही कमजोर है। मजदूरी, मेला और वन उपज का ही सहारा है। खुद कुंजीलाल शिक्षक तो नहीं बन पाए पर वन विभाग के वाचर बन गए हैं। 
कुंजीलाल 

उनका बेटा सुखलाल भी वाचर है, लेकिन ऐसी किस्मत सबकी नहीं है। ज्यादातर लोग वैसे ही मशक्कत कर रहे हैं। वन विभाग के लोगेां की धौंस जारी है। उन्हें कुछ दिए बिना झोपड़े की मरम्मत तक नहीं कर सकते।
         तभी चतर सिंह पर नजर पड़ी। मैं उसे फौरन पहचान गया। उसका चेहरा परिपक्व हो गया था लेकिन उसमें बचपन के चतर सिंह की झलक थी। उसे मेरी कुछ भी याद नहीं थी। वह उस समय दस साल का रहा होगा। आज 38-39 साल का होगा। मैंने उसे डायरी का वह हिस्सा पढ़कर सुनाया जिसमें उसके साथ मेरी बातचीत दर्ज थी। अफसोस, उसे कुछ भी याद नहीं आया। लेकिन इससे मेरे रोमांच पर फर्क नहीं पड़ा। मैं जवान चतर सिंह से मिलकर सचमुच बहुत उत्साहित था। चतर सिंह के दो बच्चे हैं।

पुरानी डायरी में चतर सिंह

चतर सिंह

‘मैं चतर सिंह के यहां आकर बैठ गया। चतर सिंह 10-12 साल का लड़का है। घर में अकेला आग के पास बैठा था। घर के अन्य सदस्य जंगल में कुटकी की कटाई के कारण वहीं हैं। चतर सिंह सड़क निर्माण कार्य में मजदूरी करने जाता है। वह बहुत मासूमियत के साथ ठहर-ठहर कर बात करता है। उसकी बातचीत में नयापन और गहरी निश्छलता होती है। उसने पूछा तुम्हारा कितना काम हो गया, कितना रह गया है। इसके बाद कहां जाओगे। मैंने उसे सब बताया। उसने कहा हां पिपरिया और बनखेड़ी का नाम सुना है पर उधर गया नहीं।  
                                                                                24 नवम्बर, 1981

         दो-तीन घर आगे ही गनपत सिंह का मकान है। हम उनसे भी मिले। गनपत सिंह, 60-65 के बीच की उम्र के हैं। उनका पुत्र संपत सिंह गांव का सरपंच है। पचमढ़ी में रहता है। एक पुत्र की हाल ही में मौत हो गई। वह रेंजर के यहां घरेलू नौकर था। तबादले के बाद रेंजर उसे साथ ले गए, छोड़ नहीं रहे थे। फिर एक दिन उसकी आत्महत्या की खबर आई। संपत का कहना है कि यह आत्महत्या नहीं है। मामले की जांच होनी चाहिए। एक अखबार में उसका बयान भी प्रमुखता से छपा है। गनपत सिंह झ्स मुद्दे पर बात करना नहीं चाहते। वे उदास निगाहों से सतपुड़ा के पहाड़ों को निहारते हैं। फिर उदास लहजे मंे कहते हैं ‘क्या करें, पड़े हैं इस गड्ढे में।’ पहाड़ों से घिरे होने के कारण उन्होंने रोरीघाट को गड्ढे की उपमा दी और यह भी उजागर कर दिया कि यहां मौके नहीं हैं। उन्होंने बताया कि लोग तो यहां से जाना चाहते हैं लेकिन सरकार कुछ करती ही नहीं। यहां क्या है? सिर्फ मेहनत, मशक्कत और अभाव। रोरीघाट में पानी और लाइट के आने को उन्होंने कोई खास तवज्जो नहीं दी। 
          हम उनके घर के पीछे आंगन में बैठे थे। उसके सामने ही सतपुड़ा के पहाड़ हैं। गनपत दादा की उदासी टूट नहीं पाती हैं। यह शायद पूरे रोरीघाट की उदासी भी है। जंगल से निकलने के लिए नौजवानो के सामने वन विभाग की चैकीदारी की नौकरी या बड़े अधिकारियों के घर काम करने का ही रास्ता बचता है। गांव के दो-तीन युवक अब भी पचमढ़ी में अफसरों के घर काम कर रहे हैं। गनपत सिंह के बेटे की मौत के पीछे भी कोई कहानी है, लेकिन उस तक पहुंचना इतना आसान नहीं है।
          यह हैरत की बात है कि बहुत कम लोग ही लोग ही यहां से निकल पाए हैं। 30 साल पहले एक भी बच्चा पचमढ़ी या मटकुली में नहीं पढ़ता था। आज चार बच्चे मटकुली और दो पढ़मढ़ी में पढ़ रहे है। पहले पचमढ़ी से नीचे उतरने वाले इक्का दुक्का ही थे। रेलगाड़ी देखने और उसमें बैठने वाले भी इक्का दुक्का लोग ही थे। आज यह संख्या बढ़ी हैं। कुंजीलाल बेटे के साथ पोते को डाॅक्टर को दिखाने के लिए बाइक से पिपरिया गए थे। तब भी यह हैरत की बात है कि गांव की आधी आबादी आज भी पचमढ़ी से नीचे नहीं उतरी है।
          रात को सोलर लाइट का महत्व समझ में आता है। महुआ ढाना में हम गजराज सिंह के झोपड़े के सामने आंगन में बैठे थे। मोहल्ले के कई लोग जमा हो गए थे। चंद कदम दूर ही स्ट्रीट लाइट जल रही थी। उसकी रोशनी आंगन के एक हिस्से पर पड़ रही थी। लोगों ने माना इससे सहूलियत हो गई है। सम्मर सिंह के झोपड़ी में एक बल्व जल रहा था। करीब साढ़े ग्यारह बजे तक वह जला। इसके बाद चिमनी से काम लेना पड़ा। लोगो ंकी छतों पर रखे सोलर लाइट के पैनल दूर से चमकते हैं।
            स्कूल और आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों के चेहरों पर मुसकान है। वे कम बोलते हैं पर हमेशा खिले रहते हैं। दो बच्चों के हाथ में तीन कमान थे। इसे उन्होंने सफाई से बनाया था। थोड़ी देर निशानेबाजी का खेल भी चला। कम बच्चे ही अपने अनुभव लिख पाए, लेकिन छोटे बच्चों ने बहुत मौज ली। स्कूल और आंगनबाड़ी ने बच्चों की जिंदगी पर असर डाला है। यह दिखाई देता है, लेकिन प्राइमरी के बाद सब कुछ बदल जाता है। सिर्फ दो-चार फीसद बच्चे ही आगे पढ़ने पचमढ़ी या मटकुली जा पाते हैं। 90-95 फीसद बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। इस स्कूल को आठवीं तक करने की मांग हो रही है। आदिवासियों को उम्मीद है कि इस साल यह आठवीं तक हो जाएगा। उसके
 बाद पचमढ़ी में इन बच्चों के लिए अलग से इंतजाम किए जाने चाहिए। कई बच्चे इकट्ठे हो गए। आंगनबाड़ी और स्कूल वाले बच्चों ने थोड़ी देर के लिए माहौल को खुशगवार बना दिया था। छोटे बच्चों के खिले चेहरे और कुछ बड़े बच्चों के जुझारूपन से रोरीधाट अब भी चमक रहा है। इस नये रोरीघाट की ताकत भी यही हैं। कई चिंताएं भी हैं मगर इनके हौसले बुलंद हैं।

Tuesday, May 8, 2012

मूर्खता का दरबार

       बचपन में एक कहानी सुनी थी। शायद पंचतंत्र से, एक बनिये का बेटा नालायक निकल गया। वह उसे घर से निकाल देता है और कहता है कि अगर तू मेरा बेटा है तो मरे चूहे से भी कमा सकता है। जब कमा लेना तब घर आना। कहानी के नायक को सचमुच एक मरा चूहा मिल जाता है और वह उसे एक बिल्ली वाले को देकर उससे मटका लेता है। फिर मटके से पानी पिलाने का काम, फिर मटका बदलकर कुछ और...इस तरह कुछ समय में ही वह धनवान बन जाता है।
      लेकिन हकीकत कहानी से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। आधुनिक युग में एक बाबा ने यही साबित किया। मरे चूहे से कमाना पुराने जमाने का कौशल था। नए जमाने में चूहे को भी नहीं मरना पड़ता और आदमी धनकुबेर बन सकता है।    चाहे तो भगवान बन सकता है और अगर भगवान बनने का दिल न चाहे तो भगवान का एजेंट भी बना जा सकता है। बाबा ने कहा आदमी अगर गुणी है तो वह मुफ्त में मिलने वाली चीज को भी बेच सकता है। प्रापर्टी से लेकर कई तरह के धंधों में हाथ आजमा चुके बाबा ने अंततः ईश्वर की कृपा बेचना तय किया। जो भी जीव संसार में आया है, वह इसलिए आ पाया क्योंकि उस पर ईश्वर की कृपा है, तमाम तरह के धर्मग्रंथ ऐसा ही कहते हैं। बाबा के नाते रिश्तेदार और दोस्त यार बिगड़े, बहुत मूखर्तापूर्ण बात है भला ईश्वर की कृपा भी कोई बेच सकता है। तुम्हें लगता है दुनिया इतनी मूर्ख है कि तुम्हारी कृपा खरीदने लाइन में लग जाएगी। बाबा बोले यही तो इस काम का मजा है कि लोगों की मूखर्ता से मुनाफा कमाओ और महान भी बन जाओ।
       बिना प्रचार प्रसार के कौन मूर्ख बाबा की कृपा खरीदने आता। इसके लिए बाबा ने कृपा का नकली दरबार लगाया। उसकी वीडियोग्राफी करवाई और फिर आकर्षक विज्ञापन तैयार करवाकर न्यूज चैनलों से संपर्क साधा। न्यूज चैनल ज्यादा कमाने की लालसा में बाबा के मूखर्ता के दरबार का प्रचार प्रसार करने को तैयार हो गए। बाबा ने उन्हें अच्छी खासी रकम दी। इधर न्यूज चैनलों की कमाई बढ़ी और उधर बाबा का धंधा भी चल निकला। कुछ दिनों में ही बाबा टीवी पर छा गए।
लोगों की जागरूकता का स्तर यह है कि वे समझें कि यह न्यूज चैनलों की लाइव रिपोर्टिंग है। वे यह सोच ही नहीं पाए कि यह विज्ञापन भी हो सकता है। बाबा की योजना कामयाब रही और बाबा का मूखर्ता का दरबार सजने लगा। बाबा विज्ञापन में बकायदा बैंकों के एकाउंट नम्बर देता है जिसमें रकम जमाकर आप दरबार में सीट बुक करवा सकते हैं। और दरबार में होता क्या है? एक ऊंचे सिंहासननुमा कुर्सी पर विराजमान बाबा किसी राजा-जमींदार की तरह जो मन में आए बोल देते हैं और वह ब्रह्म वाक्य बन जाता है। उनके उपाय और कृपा बरसाने वाली साधारण बातें भी लोगों को असाधारण लगने लगती हैं और भक्त अपनी बात कहते कहते बिलख पड़ते हैं।
        आखिर 33 करोड़ देवी देवता वाले धर्म के लोगों को कितने ईश्वर चाहिए? कितने बाबा चाहिए? बाबा के भक्तों में ज्यादातर शिक्षित हैं, लेकिन उनकी शिक्षा कितनी अधूरी है यह एक लंपट बाबा के सामने उनके समर्पण से जाहिर है। जिन आदि शक्तियों और ईश्वर की कृपा की बात की जाती है वह दलालों के माध्यम से मुमकिन ही नहीं है। उसके लिए तो बस निर्मल मन से ध्यान लगाना ही काफी है।

तीस साल पहले अंधविश्वास और जागरूकता

 1982 की बात है। किशोर भारती संस्था में अंधविश्वासों के खिलाफ एक कार्यशाला आयोजित की गई। हम जैसे आसपास के कुछ नौजवान उसमें शिरकत कर रहे थे। लोक विज्ञान संगठना महाराष्ट्र के नेतृत्च में यह कार्यशाला हो रही थी। शायद पांच दिन या हफ्ते भर की थी। कार्यशाला के दौरान लोक विज्ञान संगठना वालों ने हमें कई तरह के चमत्कारों को करने का विज्ञान समझाया। जैसे खाली हथेली से भभूत निकालना, कलश के ऊपर रखे नारियल में अचानक आग लगा देना, अंगारों पर चलना। अंतिम दिन तय हुआ कि इस प्रशिक्षण का गांव में प्रदर्शन किया जाए और अंधविश्वासों के खिलाफ मुहिम शुरू की जाए। बनखेड़ी से कोई आठ-दस किलोमीटर पर मछेरा कलां गांव है। इसी गांव से शुरुआत करनी थी। हमने एक नाटक तैयार किया कि कैसे एक बाबा चमत्कार दिखाकर जनता को भ्रमित करता है और गांव के कुछ नौजवान उसका भंडाफोड़ करते हैं और उसके चमत्कारों के पीछे का विज्ञान जनता को बताते हैं। एकलव्य, भोपाल के कमल सिंह को बाबा की भूमिका दी गईं। नाटक के पहले पांच मिनट बाबा के थे और उसके बाद दस मिनट चमत्कारों के विज्ञान पर केंद्रित थे। लेकिन गजब हो गया, बाबा के पांच मिनट होने से पहले ही उपस्थित जनसमूह उनके कदमों पर लोटने लगा। बाबा की जयकार होने लगी। ऐसा माहौल बन गया मानो सचमुच कोई महान बाबा अचानक गांव पर कृपा करने कहीं से आ गया है। हम सबको बहुत श्रम करना पड़ा यह समझाने में कि यह बाबा नहीं, हमारे नाटक का पात्र है। एक झटके में कमल सिंह की नकली दाढ़ी उखाड़ दी गई। काफी देर लगी माहौल को फिर बनाने में और तब कहीं जाकर हम पूरा नाटक कर पाए।

कैसे लगे ईश्वर का सुराग

हम सबको ही ईश्वर की बहुत जरूरत है पर अक्सर हम दलालों में उलझ जाते हैं और कुछ कर्मकांड करके ही मान लेते हैं कि हमने ईश्वर की निकटता पाली है। ईश्वर की तलाश हर इंसान करता है, हमने भी की और जो कुछ सुराग मिले वह गजल के रूप में आपके सामने है -

न मंदिरों में है कहीं, न मस्जिदों में है
भगवान तेरे मेरे सभी के दिलों में है

दाने की शक्ल में कहीं फसलों में जड़ा है
पानी की बूंद की तरह वो बादलों में है

भूख में है, प्यास में है, आस में है वो
चूल्हे की आग बनके वो सबके घरों में है
 
बच्चों की हंसी में है वो, मांओं के दिलों में
कहकहे बांटता हुआ वो पागलों में है

लालच की नाव पे’ है न तन के सुखों में है
चीखों में, घायलों में, हमारे दुखों में है

मजदूर के पसीने की खुशबू में है बसा
खेत की मिट्टी में वो हल बक्खरों में है

मुल्लाओं-पंडितों की गलतफहमियां हैं ये
वो उनके ही खींचे हुए कुछ दायरों में है

उल्फत के इस सफर में अकेला कहां हॅै तू
हरेक कदम पे’ वो तो तेरे रास्तों में है

Tuesday, February 28, 2012

वोट तुम दइयो काका रे...

         उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र का उत्सव चल रहा है। आज नोएडा में मतदान है। हम अभी सेक्टर 34 के कम्यूनिटी सेंटर में वोट डालकर लौटे हैं। हमारा वोट किसी प्रत्याशी के लिए नहीं था। हमने लोकतंत्र को वोट दिया है इसलिए कि लोकतंत्र से बेहतर व्यवस्था कहीं नजर नहीं आती लेकिन हमारे देश के लोकतंत्र में हजारों खामियां भी हैं। नोएडा में मुझे एक भी ऐसा प्रत्याशी नहीं मिला जिसे वोट दिया जाए। सरकार बनाने को आतुर एक बेसब्र दल ने यहां से गैंग रेप के आरोपी को टिकट दिया है। कांग्रेस और भाजपा ने शहर के सबसे बड़े दो डाक्टरों को मैदान में उतारा है। दोनों डाक्टरों के बड़े क्लीनिक हैं। उन्होंने इतना पैसा कमा लिया है कि अब उन्हें मरीज देखने की जरूरत नहीं है। अब वे संसद या विधानसभा में बैठकर सत्ता का स्वाद चखना चाहते हैं। इस सीट से 29 प्रत्याशी मैदान में हैं। दो ईवीएम मशीन हैं जिनमें वोट देना है। जब हम वोट डालने पहुंचे मतदानस्थल पर सन्नाटा था। चंद पुलिस वाले, दो चार दस लोग] बस।
         कई दिनों से सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर मतदाताओं को जागरूक करने का अभियान चलाया जा रहा है। एक अखबार तो लोगों को राजनीति सिखाने का दंभ भर रहा था और खुद ही अपनी पीठ भी थपथपाता था, लेकिन उस अखबार ने भयावह होते जा रहे इस लोकतंत्र की खामियों को ठीक करने के लिए राजनीतिक दलों पर न दबाव डाला न उन्हें सुझाव दिए। कभी कहते थे अखबार लोकतंत्र का चैथा खम्बा हैं, लेकिन अब यह खम्बा पटरी से उतरी लोकतंत्र की गाड़ी के लिए जैक का काम भी नहीं पा कर रहा है।
       लोकतंत्र के उत्सव के दौरान दो पुराने गीत याद आए। एक गीत कबीर से प्रेरणा लेकर बरसों पहले लिखा गया था और दूसरे गीत में लोकतंत्र की कुछ खामियांे का जिक्र है। यह दो-तीन साल पुराना गीत है। इस मौके पर दोनों गीतों को याद करना गलत नहीं होगा, तो चलिए बरसों बाद उन गीतों को हम एक बार फिर गुनगुनाएं।

संभल अब भयो धमाका रे...

सारी दुनिया की सुनो आज उलट दें रीत
जीती पाली हार है, हारी पाली जीत
उलट दैहें जो खाका रे....

बंदरा सब मिलकर लड़ें अबकी बेर चुनाव
भाषण दैवे आएगा, कौवा कांव कांव
वोट तुम दइयो काका रे....

गदहा अब पूजा करे, बजा बजा के ढोल
मंत्र पढ़ेगी लोमड़ी, जोर जोर से बोल
न खइयो कोई सनाका रे.....

शेर करेगा चाकरी, मच्छर करहैं राज
ढोर बनेंगे मंत्री, सबको एकई काज
वे फोड़े रोज पटाखा रे......

घूम घूम के दे रओ, सियार सबहे उपदेश
बीस चार सौ सूत्र हैं, सबई एक सी डिरेस
पहने के डारो डाका रे......
ये लोकतंत्र कैसा

ये लोकतंत्र कैसा
ये लोकतंत्र कैसा
नेता वहीं है जिसके पास बहुत पैसा
ये लोकतंत्र कैसा

शोक में लोक और तंत्र है गुलजार
देश में खिजां है मगर सदन में बाहर
है जिन्दा आदमी भी कागज के वोट जैसा
ये लोकतंत्र कैसा

बड़े गुंडे और मवाली करें तंत्र की रखवाली
सहमी सी रहे जनता, डरकर बजाये ताली
अब चुनाव में भी करतब दिखाए भैंसा
ये लोकतंत्र कैसा

जनता के घर में चोरी और मुनाफाखोरी
न जाने कब भरेगी, नेताओं की तिजोरी
बुत बनाएं अपना और खर्च सबका पैसा
ये लोकतंत्र कैसा

ये लोकतंत्र कैसा
दागी के दाग जैसा, ये लोकतंत्र कैसा
पैसे से बना पैसा, ये लोकतंत्र ऐसा
न मेरे तेरे जैसा, ये लोकतंत्र कैसा
ये लोकतंत्र कैसा, ये लोकतंत्र कैसा


Tuesday, October 25, 2011

अंधेरों की हलचलों में रोशनी पैदा करें

रोशनी की शुभकामनाएं
                       
(मजे की बात यह है कि आज अपने 54 साल पूरे हो गए)

अंधेरों की हलचलों में रोशनी पैदा करें
देश के सारे जिलों में रोशनी पैदा करें

जगमगा उठ्ठे जमीनें दीयों सी हर गांव में
अब किसानों के हलों में रोशनी पैदा करें

जहां बढ़ते हैं शिकारी अंधेरों के जाल ले
उन उनींदे जंगलों में रोशनी पैदा करें

बांट लें हर एक की तकलीफ अपनेआप हम
इस कदर अपने दिलों में रोशनी पैदा करें

जिंदगी मुश्किल सही पर ये क्या कम है दोस्तों
हम हमेशा मुश्किलों में रोशनी पैदा करें
                
                     (बरसों पहले एक दिवाली पर)
रोशनी को और क्या क्या चाहिए
तेल, बाती और दिया चाहिए

झिलमिलाते रहें दिये आंगनों में
और लइया की पुटरिया चाहिए

जगमगा उट्ठे रंगोली के रंग
आज इस आंगन को बिटिया चाहिए

घर के माथे पर चमकती जुगनुएं
और पांवों में पैजनिया चाहिए

तेज होती है अब दिये की लौ
और क्या तुझको सजनिया चाहिए

                                 26 अक्टूबर, 2011

Thursday, October 20, 2011

राम नाम की लूट

             कुछ लोग भारत भ्रमण पर निकलते हैं सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए लेकिन कुछ नेता वैमनस्यता बढ़ाने के लिए भी रथयात्रा जैसा प्रोप्रोगंडा करते हैं। बीस साल पहले राम जन्मभूमि के नाम पर देश में बवाल पैदा करने के लिए एक वीर पुरुष ने रथयात्रा करके देश के अमन चैन को खतरे में डाल दिया था। अब वह वयोवृद्ध नेता फिर भारत भ्रमण पर निकले हैं। इस बार उनका मुद्दा भ्रष्टाचार है हालांकि वे अपनी पार्टी शासित राज्यों में होने वाले भ्रष्टाचार पर चुप हैं।
            जिन दिनों राम के नाम पर एक दल विशेष के लोग आग उगल रहे थे। कथित सन्यासिनें ऐसी भाषा बोल रही थीं जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील और समझदार इनसान को शर्म आने लगे। ऐसे मौके पर मैंने दुर्गा स्तुति करने वाली लोक धुन जस पर एक गीत लिखा था। वह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। उन दिनों पिपरिया में इस मुद्दे पर किशन पटनायक की सभा में कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था। कट्टरपंथियों से लोहा लेकर हमने किशनजी की सभा पूरी करवाई थी।
            सन तो याद नहीं, उस साल दिल्ली में लेखक, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने मानव श्रंखला बनाकर कट्टरपंथियों की करतूतों के प्रति विरोध जताया था। इस आयोजन में कई बड़े सेलिब्रिटी शामिल हुए थे। भीष्म साहनी भी मौजूद थे। बड़ा आयोजन था। वहां मैंने यह गीत सुनाया था। उसके तुरंत बाद ही शमशुल इस्लाम आए और यह गीत नोट कर ले गए थे।

यहां प्रस्तुत है वह गीत और साथ में एक गजल-

चला धरम का डंडा

राम जनम हथकंडा, चला धरम का डंडा

तथ्य आंकड़े कुछ भी मानें
ये इतिहास के पंडा, चला धरम का डंडा

कितने मरे भइया, कितने उजड़ गये
इनका जी नई ठंडा, चला धरम का डंडा

धरम के ठेकेदार, दंगे करायें
सूफी संत हैं गुण्डा, चला धरम का डंडा

छोड़ गरीबी भइया, महंगाई को
इनका एक अजंडा, चला धरम का डंडा

आने वाला कल भइया देखेगा तुमको
फोड़ दे सारा भंडा, चला धरम का डंडा

गजल

क्यों धरम के झगड़े तू बेवजह फंसे है
राम तो प्यारे यहां कण कण में बसे है

धरम तो इंसानियत की तरह दिल में है
ईंटों की इमारत में कहीं धरम बसे है

हम रोज गड़े मुरदे उखाड़ेंगे, लड़ेंगे
दुनिया भी फिर ऐसे तमाशे पे हंसे है

उनके मुंह से झाग फिर निकले जुनून में
जिनको सांप फिरकापरस्ती का डसे है

चल अब के मोहब्बत के बीज बोएं दिलों में
नफरत की इस दलदल में कहां यार धंसे है

Monday, October 3, 2011

किसान मजदूर संगठन के नेता पर पुलिसिया हमला बनाम मार न डंडा रे

           यह संभवतः 1989 की घटना है। जब जुन्हैटा में पुलिस ने किसान मजदूर संगठन के लोगों पर हमला कर दिया था। पुलिस ने मोहम्मद आजाद को बंदूक का कुंदा मारा था और हरगोविंद को गिरफ्तार कर लिया था। गांव के लोगों ने पुलिस को घेर लिया, तब हरगोविंद ने लोगों को समझाया और संघर्ष जारी रखने का एलान किया। यह शाम की घटना थी। हम रात भर पता करते रहे कि हरगोविंद को पुलिस ने कहां रखा है, लेकिन पता नहीं चला, होशंगाबाद के दोस्तों ने बताया पुलिस उसे लेकर वहां नहीं पहुंची। हम सब मित्र रात भर परेशान रहे। सुबह पता चला कि पुलिस ने हरगोविंद को रात भर सोहागपुर थाने की हवालात में रखा था।
          इस मुद्दे को लेकर समता संगठन और किसान मजदूर संगठन ने प्रदर्शन किया और पिपरिया के मंगलवारा चैराहे पर थाने के सामने आमसभा की। इस मौके के लिए मैंने एक गीत लिखा जो बहुत लोकप्रिय हुआ। प्रदर्शन के दिन इस गीत का बोलबाला रहा। आमसभा शुरू होने से पहले मंच से यह गीत सुनाया गया और गजब हो गया। लोग गीत दोहराने लगे। दस मिनट का गीत करीब आधे घंटे तक गाया गया। थाने के सामने पानी का टैंकर खड़ा था। लोग उस पर चढ़ गए और नाच-नाचकर लगातार मार न डंडा रे गाते रहे। बड़ी मुश्किल से लोगों को रोका और आमसभा की कार्यवाही शुरू हो पाई।

यहां प्रस्तुत है वह गीत -

मार न डंडा रे
मार न डंडा रे
पुलिसिये, मार न डंडा रे
फूट गया जनता के सामने
तेरा भंडा रे....
जुल्मिये मार न डंडा रे.......

तू इस मेहनतकश को जनता को लूटे, मारे, खाये
बनते देख के इनका एका तू कैसे घबराये
भरने लगा है देख तेरे अब पाप का हंडा रे......

देखो सत्ताधारी डाकू जंगल में घुस आयें
भोली भाली जनता को ये देख देख गुर्रायें
सच की छाती पे मारें बंदूक का कुंदा रे......

तेरे झूठ का इक दिन हम मिलकर जवाब दे देंगे
तेरे इक इक अन्याय का गिनकर बदला लेंगे
तेरे डंडे में बांधेंगे अपना झंडा रे.....

मार न डंडा रे जुल्मिये
मार न डंडा रे
फूट गया जनता के सामने
तेरा भंडा रे........

Sunday, September 11, 2011

अनशन: 12 दिन और 11 साल

   कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे, रामलीला मैदान की यही हालत है। 13 दिन तक झंडा, टोपी और आंदोलनकारियों के शरीर पर तिरंगा पोतने वालों का अन्ना मेला खत्म हो गया है। वे फिर पुरानी चीजें बेचने में जुट गए हैं। अन्ना अपने घर चले गए। मैदान में अब भी कुछ पोस्टर बैनर लटके हुए हैं जो उस ऐतिहासिक अनशन की गवाही देते जान पड़ते हैं जिसने देश की सर्वोच्च संस्था संसद को भी दिन में तारे दिखा दिए।
         उधर मणिपुर में एक महिला 11 साल से अनशन पर है उसे सरकार नली के जरिये तरल खाद्य देकर जिंदा रखे हुए है। वह मणिपुर में लागू एक ऐसे कानून को खत्म करने की मांग कर रही है जिसने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (एएफएसपीए) हटाने के लिए इस लौह महिला ने अनशन करने का रिकार्ड बनाया है।
        1 नवम्बर 2000 को 29 साल की इस युवती ने अपने सामने सैन्य बलों को दस निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाकर मारते देखा था। दूसरे दिन से ही इरोम चानू शर्मिला अनशन पर बैठ गई। तीसरे दिन उन्हें आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार  कर लिया गया। अब 11 साल हो रहे हैं। लौह महिला का अनशन नहीं टूटा है। कानून के मुताबिक हर 14 दिन बाद उसे अदालत में पेश कर हिरासत अवधि बढ़ाई जाती है। अस्पताल के उस हिस्से को जेल बना दिया गया है जहां इरोम भर्ती है। कानूनन उसे एक साल से ज्यादा कैद नहीं रखा जा सकता इसलिए हर साल दो-तीन दिन की रिहाई का नाटक किया जाता है फिर गिरफ्तार  कर लिया जाता है। इस तरह सबसे ज्यादा गिरफ्तार  और रिहा होने का रिकार्ड भी इरोम के नाम है।
        मणिपुर उत्तर पूर्व का छोटा राज्य है इसलिए न देश के जागरूक लोग इसे लेकर कुछ सोच पा रहे हैं न संसद ही इस पर विचार करने को तैयार है। हमारे माननीय सांसदों ने इरोम चानू शर्मिला के उस अनशन की कीमत नहीं समझी जो मणिपुर की आम जनता के दिलों को आज भी झकझोर रहा है। कैसे लोकतंत्र के पंडित इस जांबाज महिला के अनशन की अनदेखी कर सकते हैं?
        पूरा देश अभी अन्ना के आंदोलन की आधी जीत पर खुश है। संसद के अंहकार को टूटता देखकर सबको जैसे राहत मिली हो। उस दिन हम भी अन्ना की पाठशषाला में हाजिरी लगाकर लौटे थे। अन्ना के अनशन और युवाओं का जोश देखकर अचानक ही इस लौह महिला की याद आ गई। खबर थी कि इरोम ने अन्ना से मदद मांगी है। लेकिन अन्ना या उनकी टीम ने इस बारे में क्या कहा, मालूम नहीं। 
मेट्रो से लेकर रामलीला मैदान तक हमने अनूठा नजारा देखा। लगातार जत्थे आ रहे थे। लोगों के सिर पर अन्ना टोपी और चेहरे, बांह व शरीर पर तिरंगे के रंग नजर आ रहे थे। रामलीला मैदान जैसे प्रषिक्षण स्थल बन गया था। लोग परिवार सहित रामलीला मैदान पहुंच रहे थे। अन्ना हजारे की निष्छल बातें सीधे लोगों के दिल में उतर रही थीं। उनके बोलने का तरीका और सादगी लोगों के दिल को छू गई थी, लेकिन एक सवाल रह रहकर बेचैन कर रहा था क्या अन्ना की तरह देश कभी इरोम चानू शर्मिला के इस अनूठे बलिदान का सम्मान कर पाएगा?

     उस लौह महिला को सलाम करते चंद दोहे -
           गांधी से अन्ना तलक, अनशन के कई रूप
           चले जो 11 साल तक, वह अनशन भी खूब

          12 दिन अनशन चला, देश गया ज्यों जाग
          न बदला 11 साल में, मणिपुरियों का भाग

          मीडिया से सरकार तक, था अन्ना का शोर
          किसको फुरसत थी करे शर्मिला पर गौर

          मरते देखे लोग और गई सनाका खाय
          या बदले कानून अब, या ये जान ही जाय

          एक छोटे से राज्य की वह जांबाज कमाल
          जीते जी जो बन गई सबके लिए मिसाल



Sunday, August 21, 2011

देश बोले अन्ना अन्ना

        कभी सेना में मामूली ड्राइवर रहे एक व्यक्ति ने सारे देश में अलख जगा दी। दिल्ली का रामलीला मैदान ही नहीं, देश के हर कोने में लोग नारे लगा रहे हैं कि अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। 74 साल के ये बुजुर्गवार अचानक युवाओं के दिल की धड़कन बन गए हैं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, हर उम्र और हर तबके के लोगों को जैसे उनका नायक मिल गया हो। वे उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने को तैयार हैं।
       दिल्ली में अभूतपूर्व नजारा है। रविवार को इंडिया गेट से रामलीला मैदान तक तिल रखने को जगह नहीं थी। लोगों के जोश को देखते यह वाकई आजादी की दूसरी लड़ाई लग रही है। यही हाल देश के दूसरे हिस्सों का भी है। गांवों के किसान और भूमिहीन मजूदर तक अन्ना की जंग में शामिल हो गए हैं। मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग भी आंदोलन में आ गए है। इससे साफ हो गया है कि आरएसएस रामदेव की तरह इस आंदोलन को नहीं कब्जा पाएगा। संघ के प्रवक्ता राममाधव को केजरीवाल ने तुरंत मंच से उतार दिया था।
         बहुत कम समय में ही अन्ना के त्यागमय और निष्कलंक जीवन ने उन्हें सारे का देश का हीरो बना दिया। आज वे परिवर्तन की आवाज बन गए है। निसंदेह इसमें सिविल सोसायटी के अन्य लोगों का भी अहम योगदान है। निराश और अपने में गुम लोगों को भी रोशनी नजर आने लगी है। यह वक्त है कि हमारे रहनुमा सबक लें और जनलोकपाल बिल को पारित करें वर्ना वक्त उन्हें गहरी पटकनी देने वाला है।
            अन्ना और उनके जांबाजों को सलाम करते चंद गीत
1
देश बोले अन्ना, अन्ना

देश बोले अन्ना, अन्ना
देश की तमन्ना अन्ना
गाल बजाएं, चीखे चिल्लाएं
कैसे सत्ताधारी मुन्ना
अन्ना
देश बोले अन्ना, अन्ना

ऐसी अलख जगाए
देश भर को मिलाए
सबको आस बंधाय
दूर होगा अन्याय
ऐसे समझाए
जैसे देश की हो अम्मा
अन्ना
देश बोले अन्ना, अन्ना

कैसी भ्रष्ट व्यवस्था
यहां सूझे नहीं रस्ता
हालत खस्ता और खस्ता
मद में झूमे है सत्ता
एक बूढ़ा कर गया
सरकार को घुटन्ना
अन्ना
देश बोले अन्ना, अन्ना

भ्रष्टाचारी घबराये
मंत्री अफसर बुलाये
कौन अन्ना से बचाये
ये तो लोकपाल लाये
थप्पड़ तो मारा नहीं
गाल गए झन्ना
अन्ना
देश बोले अन्ना, अन्ना
2
बोल बोल बोल...
जनता बोल बोल.....
हम करेंगे विरोध.....
धरना...अनशन....रैली......नारे
सत्ता डावांडोल .........
बोल बोल बोल...
जनता बोल बोल

चुनी हुई सरकार ही रौंदे
तेरे मेरे हक को भाई
वे समझें जनता को बकरा
और बन जाए खुद ही कसाई
हम करेंगे विरोध.....
धरना...अनशन....रैली......नारे
सत्ता डावांडोल .........
बोल बोल बोल...
जनता बोल बोल

कानून है तेरी व्यवस्था
और विरोध हमरा अधिकार
तू कानून की धौंस दिखाए
एका है हमरा हथियार
हम करेंगे विरोध.....
धरना...अनशन....रैली......नारे
सत्ता डावांडोल .........
बोल बोल बोल...
जनता बोल बोल

पहले घोटाले करवाये
फिर जांच की नौटंकी
संसद में ऐसे चीखे हैं
जैसे जंगल में मंकी
हम करेंगे विरोध.....
धरना...अनशन....रैली......नारे
सत्ता डावांडोल .........
बोल बोल बोल...
जनता बोल बोल

3
सरकार लपूझन्ना
तेरी खबर लैहे अन्ना

रिश्वत ने खाई
सारे देश की कमाई
नेता मुटाए और
बढ़ गई महंगाई
आंख वाले मंत्रियों को
पड़े न दिखाई
कांपी सरकार जब...
हुंकार भरे अन्ना
सरकार लपूझन्ना

ए राजा, सी राजा
खूब बजा गए बाजा
संसद में क्या पहंुचे
कर गए वे घोटाला
इसमें लगा दो जन
लोकपाल का ताला
घूसखोर कांपे.......
सरकार गई भन्ना
सरकार लपूझन्ना

संसद में चीखे
चिल्लाए खूब सिब्बल
जनता है पीछे और
संसद है अव्वल
हम बनाएं कानून
हम बांटें कम्बल
चीखा विपक्ष फिर.....
और चूसो गन्ना तुम
और चूसो गन्ना
सरकार लपूझन्ना
तेरी खबर लैहे अन्ना

4
अरा रा रा...

जनलोकपाल बिल ये हमारा
अरा रा रा.... पेश कर दइयो
जन का समझ ले इशारा
अरा रा रा... पेश कर दइयो

चुल्लू भर पानी में डुबकी लगाये
भ्रष्टाचार के कीचड़ में नहाये
कैसी सरकार है जरा न शरमाये
जा कैसी सरकार है जरा न शरमाये
पहचान जनता का नारा
अरा रा रा....पेश कर दइयो
जनलोकपाल बिल ये हमारा
अरा रा रा.... पेश कर दइयो

टोपी पहन देखो फिर आया गांधी
टूटे दिलों को जिसने आस बांधी
गंावों तक जा पहंुची अन्ना की आंधी
क्यों संसद में बैठा नाकारा
अरा रा रा....पेश कर दइयो
जनलोकपाल बिल ये हमारा
अरा रा रा.... पेश कर दइयो

जनता ने तुझको चुना है तू सुन ले
वक्त है जनता की उम्मीद गुन ले
वर्ना समझ तेरी बत्ती ही गुल है
मिलेगा जवाब करारा
अरा रा रा....पेश कर दइयो
जनलोकपाल बिल ये हमारा
अरा रा रा.... पेश कर दइयो




Sunday, March 13, 2011

सुमरना ऐसे दोस्त को जो बिना मिले ही चला गया, बहुत दूर.....


कृष्णमूर्ति
कैसे सुमरें यार अब फटो कलेजा जाय
तूही अब जो ने रहो, आल्हा कौन सुनाय
तेरे संगे बीत गए कितने ही दिन-रात
टेम भी पूरो ने पड़ो, रही अधूरी बात
मिलके खूब उड़ाई है गांव-गैल की धूल
दिन समता - संघर्ष के कैसे जाएं भूल


दोस्तों को ऐसे भी सुमरना पड़ेगा, कभी सोचा नहीं था। कृष्णूमूर्ति अब नहीं है, विश्वास नहीं होता। उम्र में हमसे छोटा, सेहत में बेहतर और जवानी के दिनों की ऊर्जा से लबरेज वह दोस्त अब कभी नहीं मिलेगा, यह कलेजा चीरने वाली बात है। बीच में कई बरस हम नहीं मिले। पिपरिया छूटा तो बहुत से दोस्तों का साथ भी छूट गया। कृष्णमूर्ति भी उनमें से एक था। करीब पांच साल पहले जब मैं सहारा समय साप्ताहिक में बच्चों का पेज देखता था तब एक दिन आफिस में उसका पोस्टकार्ड मिला। लिखा था, जब मैं बच्चों से कहता हूं कि सहारा समय के बचपन वाले नरेंद्र मौर्य पिपरिया के हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है। फिर पिपरिया में गुूलेल कला कांरवा कार्यक्रम में वह पत्नी-बच्चों समेत मौजूद था। उसके बाद एक बार नोएडा भी आया, एक रात रुका। तब ढेरों बातें हुई थीं। बरसों से जो कड़ी टूट गई थी वह फिर जुड़ने लगी। इसमें नया पन्ना जोड़ा सुरजीत ने। उसे इंडिया फाइन आर्ट आॅॅफ बेंगलुरू की फेलोशिप मिली थी। फेलोशिप हमारे 22 साल पुराने एक अनुभव से जुड़ी थी, ‘आल्हा से न्यू मीडिया तक’। कृष्णमूर्ति, वीरेंद्र और मैंने 1988 में एक गांव पर पुलिस अत्याचार की कहानी आल्हा के शिल्प में कही थी। सुरजीत हम तीनों रचनाकारों से इकट्ठे बात करना चाहता था। 29-30 जून 2010 के दो दिन हम चार लोगों ने एक साथ गुजारे। ढेरों बातें की। आगे की योजनाएं भी बनीं।

एक पूरी दोपहर हमने मशहूर चित्रकार और नर्मदा परकम्मावासी अमृतलाल वेगड़ के घर गुजारी। वेगड़जी से बात हुई तो उन्होंने पूछा लोकल का कौन है आपके साथ जिसे वे बताएं कि उनके घर कैसे पहुंचना है। तब कृष्णमूर्ति ने ही वेगड़जी से बात की थी और हमें उनके घर ले गया था। वेगड़जी से ढेरों बातें कीं। उनके काम और परकम्मा के अनुभव सुने। मूर्ति ने हमारे ठहरने का इंतजाम कृषि विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में किया था। वहां हमने बुदनी कांड की आल्हा को लेकर लंबी बातचीत की। हम सभी रोमांचित थे। 22 साल पुराने रचनात्मक अनुभव को मिलकर याद करना बहुत सुखद था। बातचीत चल ही रही थी कि अचानक बाहर तेज बारिश शुरू हो गई। मूर्ति ने कहा, लो हम आल्हा की बात कर रहे हैं और बाहर पानी बरसने लगा। बुंदेलखंड में आल्हा बरसात के दिनों में ही गाई जाती है।

यह भी संयोग हैं कि सबसे पहले हमारा रिश्ता मूर्ति के पिताजी के साथ बना। हम उन्हें जमना काका कहते थे। असल में जमना काका की दुकान पर ललित अग्रवाल बैठते थे। खासकर शाम को वहां बैठक जमती थी। उन दिनों वीरेंद्र, बालेंद्र और हम ललित भाई के साथ साहित्य चर्चा के लिए वहां पहुंच जाते थे। जमना काका का हम तीनों पर ही बहुत स्नेह था। 1980 के बाद जब समता युवजन सभा में हम लोग सक्रिय हुए तो मूर्ति का साथ मिला। उसके बाद दस साल हम लोग लगातार साथ रहे। भगतसिंह पुस्तकालय हम लोगों के मिलने और काम करने का अड्डा बना। जब मूर्ति होशंगाबाद के पास पंवारखेड़ा कृषि फार्म में लेब असिस्टेंट बन गया, तब भी उसका अड्डा भगतसिंह पुस्तकालय ही बना रहा। कितनी ही बार वह पंवारखेड़ा में हाजिरी लगाकर अगली गाड़ी से लौट आता था। फिर देर रात राजनीतिक - सांस्कृतिक गतिविधियों में जुटा रहता।

उस समय हम लोग लोक गीत-संगीत का उपयोग जनसंघर्षों में करने की सोच रहे थे। 25 दिसम्बर, 1985 को केसला में आदिवासी मजदूर संगठन का पहला सम्मेलन हुआ। उसके लिए हमने ‘एका ऐसो बनाएं’ नाम से जन गीतों का प्रकाशन किया था। इसके बाद जब बुदनी कांड हुआ तो आल्हा लिखने का तय हुआ। इसमें कृष्णमूर्ति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। असल में उस पूरे आंदोलन में मूर्ति की खास भूमिका थी। वह कितनी ही बार वीरेंद्र के साथ बुदनी गया। फ्रंट लाइन की विशेष संवाददाता वसंता सूर्या तीन-चार दिन के लिए पिपरिया आईं। मूर्ति ही उन्हें बुदनी ले गया था। वे मूर्ति से बहुत प्रभावित थीं। वे 50-55 के आसपास की थीं और उन्हें मूर्ति अपने बेटे जैसा लगता था। उन्होंने 1988 के एक अंक में बुदनी आंदोलन को लेकर पांच पेज की कवर स्टोरी लिखी थी। उन्होंने बुदनी की आल्हा का अंग्रेजी अनुवाद भी किया जो बाद में प्रकाशित भी हुआ। आल्हा को आंदोलन के दिनों में ही पूरा करवाकर छपवाना और फिर रिकार्ड कर गली.मोहल्लों में कैसेट बजवाने तक मूर्ति ने जिस तेजी के साथ काम किया था वह अद्भुत था।

बुदनी की आल्हा के बाद हमने जंगल रामायण लिखने की योजना बनाई। समता का काम जंगल पट्टी में बढ़ रहा था। गोंड-कोरकू आदिवासी लगातार उत्पीड़ित किए जा रहे थे। गांवों में हमारे दौरे बढ़ गए थे। हमने रामचरित मानस की तर्ज पर अलग-अलग कांडों में जंगल की कहानी कहना तय किया। तीनों के बीच विषय बंट गए, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। हम तीनों ने ही जंगल कांड को अलग-अलग हिस्सों में लिखा लेकिन एक-दूसरे को सुनाने का मौका नहीं मिला। हम सब लोगों का पिपरिया से ठियां उजड़ गया। बरसों बाद मेरे हिस्से के जंगल कांड का पाठ 2005 के गुलेल कला कारवां में किया गया। कृष्णमूर्ति ने ठीक ही कहा था, बुदनी की आल्हा इसलिए पूरी होकर अपनी भूमिका निभा पाई क्योंकि उसके साथ आंदोलन चल रहा था। जंगल रामायण के साथ कोई आंदोलन नहीं था इसलिए वह पूरी नहीं हो पाई।

30 जून 2010 को लंबी बातचीत के हमने आल्हा गाई। हमेशा की तरह कृष्णमूर्ति आगे रहा। उसने पूरी आल्हा बहुत मजे के साथ गाई। हम और वीरेंद्र ने तो बीच-बीच में मूर्ति का साथ दिया। मूर्ति फिर पुराने रंग में दिखा। सुरजीत ने पूरे गायन को रिकार्ड कर लिया। यह अनुभव अहसास करवाते रहता है कि मूर्ति यही आसपास है। आप भी सुनिये।


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